सुप्रीम कोर्ट ने महिला अभ्यर्थी को नौकरी दिलाने स्पेशल पावर का किया इस्तेमाल, कोल इंडिया को स्पेशल पद सृजित करते हुए सुजाता को नौकरी देने का दिया निर्देश, हाईकोर्ट का आदेश भी बदला
The Supreme Court used its special powers to secure a job for a female candidate, directing Coal India to create a special post and employ Sujata, thereby overturning the High Court's order.

Court Big News : सुप्रीम कोर्ट ने कोल इंडिया लिमिटेड को निर्देश दिया है कि वह एक महिला उम्मीदवार के लिए विशेष (Supernumerary) पद सृजित करे।
महिला ने सभी चयन प्रक्रिया में सफलता हासिल की थी, बावजूद उसे साल 2016 में नौकरी से वंचित कर दिया गया था। दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों को मजबूती देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संवेदनशील फैसला सुनाया।
शीर्ष अदालत ने कोल इंडिया लिमिटेड के चेयरमैन को निर्देश दिया कि वे महिला उम्मीदवार के लिए विशेष (Supernumerary) पद सृजित करें, जिसे वर्ष 2016 की चयन प्रक्रिया में सफल होने के बावजूद नौकरी नहीं दी गई थी। नौकरी से वंचित किए जाने का कारण यह बताया गया था कि उम्मीदवार एक से अधिक दिव्यांगताओं (Multiple Disabilities) से पीड़ित है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने ये आदेश पारित किया। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दिया गया है और इसे भविष्य में नज़ीर (precedent) के रूप में नहीं देखा जाएगा। याचिकाकर्ता सुजाता बोरा ने वर्ष 2016 में कोल इंडिया लिमिटेड में मैनेजमेंट ट्रेनी (पर्सनल एंड एचआर) पद के लिए आवेदन किया था।
उन्होंने दृष्टिबाधित श्रेणी के अंतर्गत आवेदन किया था, क्योंकि उस समय जारी विज्ञापन में एक से अधिक दिव्यांगताओं वाले उम्मीदवारों के लिए कोई अलग प्रावधान नहीं था।
सुजाता बोरा ने चयन प्रक्रिया के तहत इंटरव्यू सफलतापूर्वक पास किया, लेकिन मेडिकल परीक्षण के दौरान यह सामने आया कि वह केवल दृष्टिबाधित ही नहीं, बल्कि दोनों आंखों में लगभग 60 प्रतिशत कम दृष्टि (Low Vision) और रेज़िडुअल पार्टियल हेमीपेरेसिस (शारीरिक कमजोरी) से भी पीड़ित हैं।
इसी आधार पर कोल इंडिया ने उन्हें नौकरी देने से इनकार कर दिया। इस निर्णय को चुनौती देते हुए सुजाता बोरा ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट ने 3 जुलाई 2024 को उन्हें राहत देने से इंकार कर दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने न केवल हाईकोर्ट के आदेश को रद्द किया, बल्कि कोल इंडिया को स्पष्ट निर्देश दिए कि सुजाता बोरा को उनकी क्षमताओं के अनुरूप एक उपयुक्त डेस्क जॉब दी जाए।
कोर्ट ने कहा कि उन्हें अलग कंप्यूटर और कीबोर्ड जैसी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, जो दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 2(ze) में परिभाषित ‘यूनिवर्सल डिजाइन’ के अनुरूप हों। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि सुजाता बोरा को नॉर्थ ईस्टर्न कोल फील्ड्स, कोल इंडिया लिमिटेड, मार्गेरिटा (तिनसुकिया, असम) में तैनात किया जाए।
न्यायालय ने कहा कि चूंकि अपीलकर्ता 2016 में चयन प्रक्रिया में योग्य पाई गई थीं और गलती उनकी नहीं थी, इसलिए उनके लिए एक विशेष पद सृजित किया जाना पूरी तरह न्यायसंगत है। आदेश पढ़ते हुए जस्टिस पारदीवाला ने संविधान और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का हवाला दिया।
उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के मानवाधिकार सिद्धांतों के अनुसार दिव्यांग व्यक्तियों का समावेशन केवल कानूनी बाध्यता नहीं, बल्कि समाज और कॉरपोरेट जगत के लिए एक रणनीतिक लाभ भी है।
कोर्ट ने ESG (Environmental, Social and Governance) ढांचे का उल्लेख करते हुए कहा कि दिव्यांगों को रोजगार में शामिल करना एक महत्वपूर्ण सामाजिक जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार), अनुच्छेद 41 और अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए पारित किया।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने AIIMS, नई दिल्ली को एक मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया था, जिसमें प्रसिद्ध ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. सतेन्द्र सिंह भी शामिल थे। बोर्ड का उद्देश्य यह तय करना था कि सुजाता बोरा बेंचमार्क डिसएबिलिटी और मल्टीपल डिसएबिलिटी की श्रेणी में आती हैं या नहीं।









