सावधान! ‘कैशलेस’ के भरोसे न रहें; ऐन वक्त पर धोखा दे सकती है आपकी हेल्थ पॉलिसी
Beware! Don't rely on 'cashless'; your health policy could fail you at the last moment.

स्वास्थ्य बीमा आज के समय में हर परिवार के लिए बेहद जरूरी हो गया है, खासकर ‘कैशलेस’ सुविधा जो अस्पताल के भारी-भरकम बिलों के तनाव को कम करती है। लेकिन क्या आपका कैशलेस हेल्थ इंश्योरेंस वाकई संकट के समय 100% साथ निभाएगा? हालिया आंकड़े और एक्सपर्ट्स की राय कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।
अगर आप भी यह सोचते हैं कि जेब में सिर्फ एक एक्टिव हेल्थ इंश्योरेंस कार्ड होने से अस्पताल का सारा खर्च अपने आप चुका दिया जाएगा, तो आपको सावधान होने की जरूरत है। प्रीमियम समय पर भरने के बावजूद हर साल हजारों पॉलिसीधारकों के कैशलेस क्लेम रिजेक्ट या होल्ड हो रहे हैं। आइए जानते हैं कि जरूरत के समय आपका कैशलेस क्लेम क्यों धोखा दे सकता है।
एक्टिव पॉलिसी फिर भी जेब से देना पड़ रहा है पैसा: आखिर क्यों?
पॉलिसीबाजार डॉट कॉम के हेल्थ इंश्योरेंस बिजनेस हेड सिद्धार्थ सिंघल के मुताबिक, “कैशलेस क्लेम का मकसद इलाज की प्रक्रिया को आसान और आर्थिक रूप से तनावमुक्त बनाना है। लेकिन कई बार पॉलिसी एक्टिव होने के बावजूद क्लेम अटक जाता है, देरी होती है या आंशिक रूप से ही मंजूर (Partial Approval) होता है। ज्यादातर मामलों में यह फैसला पॉलिसी की स्थिति के कारण नहीं, बल्कि उसकी जटिल शर्तों और अधूरे दस्तावेजों के कारण होता है।”
विशेषज्ञों के अनुसार, क्लेम अटकने या रिजेक्ट होने के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:
1. ‘वेटिंग पीरियड’ (प्रतीक्षा अवधि) का पेच
हेल्थ इंश्योरेंस लेते ही हर बीमारी का इलाज तुरंत कवर नहीं होता। पहले से मौजूद बीमारियों (Pre-existing diseases) जैसे डायबिटीज या बीपी के लिए आमतौर पर 2 से 4 साल का वेटिंग पीरियड होता है। इसके अलावा, कुछ खास बीमारियों (जैसे मोतियाबिंद या पथरी) के लिए भी शुरुआती 1 से 2 साल का लॉक-इन पीरियड होता है। यदि इस दौरान क्लेम किया जाए, तो वह सीधे रिजेक्ट हो जाता है।
2. हर खर्च बीमा के दायरे में नहीं होता (Non-Medical Expenses)
पॉलिसीधारक अक्सर यह मान लेते हैं कि अस्पताल का पाई-पाई का खर्च कंपनी उठाएगी। लेकिन हकीकत यह है कि अस्पताल के बिल में कई ‘न न-मेडिकल’ खर्च शामिल होते हैं, जैसे:
दस्ताने (Gloves), मास्क और पीपीई किट
सर्विस चार्ज या एडमिनिस्ट्रेटिव फीस
मरीज के अटेंडेंट का खाना या अतिरिक्त सुविधाए
ये खर्च ‘कंज्यूमेबल्स’ के तहत आते हैं और ज्यादातर पॉलिसियों में इनके पैसे मरीज को खुद अपनी जेब से देने पड़ते हैं।
3. रूम रेंट की सीमा (Room Rent Capping)
कई पुरानी या बेसिक पॉलिसियों में रूम रेंट की एक तय सीमा होती है (जैसे कुल सम एश्योर्ड का 1% प्रति दिन)। यदि आप उस सीमा से महंगा कमरा चुनते हैं, तो सिर्फ कमरे का अंतर ही नहीं, बल्कि डॉक्टर की फीस और सर्जरी का खर्च भी उसी अनुपात में बढ़ जाता है, जिसका भुगतान कंपनी नहीं करती।
4. दस्तावेजों में कमियां और देरी
कैशलेस क्लेम के लिए अस्पताल के इंश्योरेंस डेस्क को समय पर सही दस्तावेज और डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन भेजना होता है। यदि बीमारी का इतिहास (Medical History) छुपाया गया हो या दस्तावेजों में विसंगति हो, तो टीपीए (Third Party Administrator) क्लेम को तुरंत रोक देता है।
एक्सपर्ट सलाह: हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय सिर्फ कम प्रीमियम और बड़ी बीमा राशि (Sum Insured) न देखें। पॉलिसी के नियमों और शर्तों (Policy Wordings) को ध्यान से पढ़ें। यह जरूर जांचें कि कौन सी बीमारियां कब से कवर होंगी और किन चीजों का पैसा आपको खुद देना होगा।
क्लेम रिजेक्शन से कैसे बचें?
सच्चाई न छुपाएं: पॉलिसी लेते समय अपनी पुरानी बीमारियों या आदतों (जैसे स्मोकिंग) की सही जानकारी दें।
नेटवर्क अस्पताल ही चुनें: कैशलेस सुविधा का लाभ केवल उन्हीं अस्पतालों में मिलता है जो बीमा कंपनी के पैनल (Network Hospitals) में शामिल होते हैं।
प्री-ऑथराइजेशन फॉर्म जल्दी भरें: प्लान्ड सर्जरी के मामले में 48 घंटे पहले और इमरजेंसी में भर्ती होने के 24 घंटे के भीतर अस्पताल के इंश्योरेंस डेस्क को सूचित करें।









