भू-राजनीतिक हलचल: अगले हफ्ते उत्तर कोरिया जाएंगे शी जिनपिंग, पुतिन-किम की बढ़ती नजदीकी के बीच ‘बड़े भाई’ का दांव
Geopolitical turmoil: Xi Jinping to visit North Korea next week, 'big brother' bet amid growing Putin-Kim closeness

एशियाई भू-राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आ रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले हफ्ते उत्तर कोरिया के दो दिवसीय आधिकारिक दौरे पर जा रहे हैं, जहां वह उत्तर कोरियाई सर्वोच्च नेता किम जोंग उन से मुलाकात करेंगे। दोनों देशों के सरकारी मीडिया द्वारा साझा की गई जानकारी के मुताबिक, यह बेहद महत्वपूर्ण यात्रा 8 से 9 जून तक होगी।
जिनपिंग की प्योंगयांग की यह यात्रा करीब सात साल बाद हो रही है; इससे पहले उन्होंने 2019 में उत्तर कोरिया का दौरा किया था। रणनीतिक रूप से यह यात्रा बेहद संवेदनशील समय पर हो रही है, क्योंकि कुछ ही हफ्ते पहले जिनपिंग ने बीजिंग में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मेजबानी की थी। अब पुतिन के बाद किम जोंग उन से उनकी यह मुलाकात वैश्विक समीकरणों को बदलने का दम रखती है।
रूस की एंट्री से बदला समीकरण: अब सिर्फ चीन के भरोसे नहीं किम
कुछ साल पहले तक उत्तर कोरिया पर पूरी तरह से चीन का दबदबा माना जाता था। आर्थिक हो या राजनीतिक, उत्तर कोरिया हर मोर्चे पर बीजिंग का ‘जूनियर पार्टनर’ बनकर रहने को मजबूर था। लेकिन यूक्रेन युद्ध ने इस समीकरण को पूरी तरह पलट दिया है।
पुतिन-किम की जुगलबंदी: यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस और उत्तर कोरिया के रिश्ते अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। उत्तर कोरिया ने रूस को भारी मात्रा में हथियार और सैनिक मुहैया कराए हैं, जिसके बदले मॉस्को ने प्योंगयांग को तेल, अनाज, विदेशी मुद्रा और सबसे महत्वपूर्ण—उन्नत सैन्य व हथियार तकनीक देकर उसकी झोली भर दी है।
बदला किम का अंदाज: रूस से मिले इस ‘आर्थिक और तकनीकी ऑक्सीजन’ के दम पर अब किम जोंग उन खुद को चीन के सामने कमजोर नहीं दिखाना चाहते। वे इस रूसी नजदीकी का इस्तेमाल बीजिंग से और ज्यादा आर्थिक रियायतें वसूलने के लिए एक सौदेबाजी (Leverage) के रूप में कर रहे हैं।
चीन की मजबूरी और अनोखी रक्षा संधि
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों से घिरे उत्तर कोरिया का चीन हमेशा से सबसे बड़ा ढाल रहा है। दोनों देशों के बीच 1,400 किलोमीटर लंबी सीमा तो है ही, साथ ही एक बेहद अनोखी रक्षा संधि भी है।
नोट: यह सैन्य समझौता चीन की किसी भी देश के साथ एकमात्र सक्रिय रक्षा संधि है, जिसके तहत यदि किसी एक देश पर हमला होता है, तो दूसरा देश सैन्य रूप से उसकी मदद के लिए बाध्य है। इस साल इस ऐतिहासिक संधि के 65 साल पूरे हो रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस और उत्तर कोरिया के बीच का नया गठबंधन शी जिनपिंग को असहज कर रहा है।
एशिया सोसाइटी के सीनियर फेलो जॉन डिल्यूरी के अनुसार, “चीन निश्चित रूप से रूस-उत्तर कोरिया की इस नई करीबी से चिंतित है और शी जिनपिंग की यह यात्रा इसी चिंता का जवाब है, ताकि किम को याद दिलाया जा सके कि उनका असली ‘अन्नदाता’ अब भी बीजिंग ही है।”
परमाणु मुद्दे पर फंसा पेंच: अमेरिका, चीन और उत्तर कोरिया
इस शिखर वार्ता में सबसे बड़ा और पेचीदा मुद्दा उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम होने वाला है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद व्हाइट हाउस ने दावा किया था कि चीन भी उत्तर कोरिया के पूरी तरह परमाणु निरस्त्रीकरण (Denuclearization) के पक्ष में है। हालांकि, चीन के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर इस दावे को खारिज कर दिया था।
देश परमाणु कार्यक्रम पर वर्तमान रुख
उत्तर कोरिया (किम जोंग उन) परमाणु हथियारों को अपनी सुरक्षा की गारंटी मानते हैं। उन्होंने साफ किया है कि इस मुद्दे पर कोई बातचीत या समझौता नहीं होगा।
चीन (शी जिनपिंग) आधिकारिक तौर पर परमाणु हथियारों का विरोध करता है (ताकि दक्षिण कोरिया और जापान परमाणु रेस में न आएं), लेकिन अब अमेरिका के खिलाफ उत्तर कोरिया के मिसाइल टेस्टों का UNSC में बचाव करता है।
रूस (व्लादिमीर पुतिन) उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम के प्रति पूरी तरह नरम हो चुका है। मार्च 2024 में रूस ने UN के उस पैनल पर वीटो लगा दिया जो उत्तर कोरियाई प्रतिबंधों की निगरानी करता था।
कोविड के बाद वापसी की कोशिश में उत्तर कोरिया
महामारी के दौरान सीमाएं पूरी तरह बंद होने से उत्तर कोरिया का व्यापार ठप हो गया था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। मार्च में ही चीन और उत्तर कोरिया के बीच ट्रेन और विमान सेवाएं दोबारा बहाल की गई हैं।
अब किम जोंग उन की नजर चीनी पर्यटकों पर है। संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के दायरे से बाहर होने के कारण, उत्तर कोरिया ने अपने समुद्री तटों पर चमचमाते रिसॉर्ट और पहाड़ी इलाकों में ‘हॉट स्प्रिंग’ (गर्म पानी के झरने) प्रोजेक्ट्स विकसित किए हैं ताकि चीनी सैलानियों के जरिए विदेशी मुद्रा की कमाई की जा सके।
निष्कर्ष: शी जिनपिंग की यह यात्रा केवल एक द्विपक्षीय मुलाकात नहीं, बल्कि अमेरिका और रूस दोनों को बीजिंग की ताकत का अहसास कराने का जरिया है। दुनिया की नजरें अब प्योंगयांग से निकलने वाले संयुक्त बयान पर टिकी हैं।









