झारखंड हाईकोर्ट : लिव इन रिलेशन की बात पति ने पत्नी से छुपाई, कोर्ट ने कहा, ये तो धोखाधड़ी, LLB पत्नी का अफसर पति से शादी तोड़ने का फैसला सही, निचली कोर्ट ने 30 लाख रुपये…..

Jharkhand High Court: Husband hid the fact of live-in relationship from his wife, court said, this is fraud, LLB wife's decision to break the marriage with her officer husband was correct, lower court awarded Rs 30 lakh...

Jharkhand Highcourt News : झारखंड हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के रिश्ते को लेकर बेहद ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि शादी से पहले यदि पति महत्वपूर्ण तथ्य छिपाकर पत्नी की सहमति लेता है, तो ऐसा विवाह कानून की नजर में टिकाऊ नहीं माना जा सकता। लिव-इन रिलेशनशिप जैसी जानकारी छिपाना धोखाधड़ी है और इसके आधार पर विवाह को निरस्त किया जाना सही है।
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रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा है कि विवाह से पहले पारदर्शिता और ईमानदारी अनिवार्य है।

जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस गौतम कुमार चौधरी ने पति की सभी दलील को खारिज करते हुए फैसला सुनाया है कि यदि पति विवाह से पूर्व अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाता है और धोखे से पत्नी की सहमति प्राप्त करता है, तो ऐसा विवाह कानून के नजरिये से धोखाधड़ी है।

हाई कोर्ट ने गढ़वा फैमिली कोर्ट के 16 फरवरी 2017 के फैसले को बरकरार रखते हुए विवाह को निरस्त करने के आदेश को सही ठहराया।

यह मामला प्रियंका साही और सिद्धार्थ राव उर्फ राहुल से जुड़ा है, जिनका विवाह 2 दिसंबर 2015 को गोरखपुर में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था। विवाह के कुछ समय बाद ही दोनों के रिश्ते में गंभीर मतभेद सामने आ गए, जिसके बाद मामला अदालत तक पहुंचा।

पत्नी प्रियंका साही ने कानून की पढ़ाई की है, जबकि पति एक सीनियर अफसर हैं। पत्नी प्रियंका ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि विवाह के बाद उसे यह जानकारी मिली कि उसका पति पहले से ही एक अन्य महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह चुका था।

यह तथ्य जानबूझकर उससे छिपाया गया, जबकि यह विवाह के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी थी। पत्नी का कहना था कि यदि उसे इस संबंध की सच्चाई पहले से मालूम होती, तो वह विवाह के लिए सहमति नहीं देती।

याचिका में यह भी कहा गया कि ससुराल पहुंचने के कुछ ही दिनों बाद उससे 15 लाख रुपये अतिरिक्त दहेज की मांग की गई। मांग पूरी न होने पर उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, जिससे उसका वैवाहिक जीवन पूरी तरह टूट गया।

इन परिस्थितियों में पत्नी ने फैमिली कोर्ट में विवाह निरस्तीकरण की याचिका दायर की।गढ़वा फैमिली कोर्ट ने सभी साक्ष्यों और तथ्यों पर विचार करते हुए पत्नी की याचिका स्वीकार की थी।

कोर्ट ने माना था कि विवाह से पहले पति द्वारा अपने लिव-इन रिलेशनशिप को छिपाना हिंदू विवाह अधिनियम के तहत धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है। इसी आधार पर कोर्ट ने विवाह को शून्य घोषित कर दिया और पति को पत्नी के पक्ष में 30 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था।

इस फैसले के खिलाफ पति ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। अपील में पति का तर्क था कि फैमिली कोर्ट ने उसे अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया और एकतरफा कार्यवाही की।

हालांकि, हाई कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि पति को कई बार समन और नोटिस भेजे गए थे, लेकिन उसने जानबूझकर अदालत में उपस्थित न होकर कार्यवाही से दूरी बनाए रखी।

ऐसे में फैमिली कोर्ट द्वारा एकतरफा सुनवाई करना पूरी तरह वैध और न्यायसंगत था।खंडपीठ ने यह भी टिप्पणी की कि दोनों पक्ष वर्ष 2016 से अलग रह रहे हैं और वैवाहिक संबंध पूरी तरह मृत अवस्था में पहुंच चुका है।

अदालत ने कहा कि ऐसे रिश्ते को जबरन बनाए रखना किसी भी पक्ष के हित में नहीं है और इससे केवल मानसिक पीड़ा ही बढ़ेगी।हाई कोर्ट ने स्थायी गुजारा भत्ते के मुद्दे पर भी संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की बात कही। अदालत ने माना कि गुजारा भत्ता तय करते समय पति की आय, सामाजिक स्थिति और पत्नी की शैक्षणिक योग्यता जैसे सभी पहलुओं पर विचार किया जाना आवश्यक है।

रिकॉर्ड के अनुसार पति एक निजी कंपनी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत है और उसकी मासिक आय लगभग 1.56 लाख रुपये है, जबकि पत्नी कानून स्नातक (एलएलबी) होने के बावजूद वर्तमान में बेरोजगार है।

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