मां के हाथ में स्लाइन बेटा डॉक्टर डॉक्टर चिल्लाता रहा.. डॉक्टर फोटो शूट कराने में रहे मस्त इधर पिता ने सदर अस्पताल की चौखट पर तोड़ दिया दम … इस शर्मनाक घटना का कौन है जिम्मेदार स्वास्थ्य मंत्री जी?

Health News: स्वास्थ्य मंत्री जी आपके राज में ये क्या हो रहा है ? मीडिया के सामने आप दावे तो खूब कर रहे हैं परंतु आपके दावे हवा हवाई साबित हो रहे हैं। जिस राज्य का स्वास्थ्य मंत्री खुद चिकित्सक हो और उनके राज में मरीज अस्पताल की गेट पर डॉक्टर – डॉक्टर चिल्लाते चिल्लाते मर जाए …. इससे ज्यादा दुखदाई और शर्मनाक घटना और क्या हो सकती हैं….

जी हां , ये घटना बिल्कुल सौ फीसदी सही है।पहले बेड खाली नहीं होने का बहाना फिर रांची रिम्स से लेकर सदर अस्पताल तक की भागदौड़ ,उससे भी बात नहीं बनी तो लाचार बेटे ने एंबुलेंस में ही अपने पिता का इलाज कराना शुरू किया। अंदाजा लगाइये उस स्थिति को जब एक तरफ मां स्लाइन की बोतल पकड़े खड़ी है तो दूसरी तरफ एक लाचार बेटा भाग दौड़ कर डॉक्टर डॉक्टर चिल्लाते रह गया उसके वावजूद डॉक्टर ने फोटो शूट कराना मुनासिब समझा क्योंकि उन्हें मरीज की जान बचाने से कोई सरोकार नहीं बल्कि बिना काम किए फोटो शूट कराकर मीडिया में  सुर्खियां जो बननी है। …. हद हो गईं मंत्री जी, अब झूठे दावे करना बंद कीजिए!

क्या है मामला

मामला लातेहार जिला का है जहां चंदवा सरोज नगर निवासी आशीष अग्रवाल अपने पिता राम प्रसाद अग्रवाल को नहीं बचा पाए, क्योंकि तीन दिनों तक उन्हें रिम्स या सदर अस्पताल में कोई खाली बेड नहीं मिला. लाचार बेटा अपने पिता को एम्बुलेंस में लेकर 7 से 9 अक्टूबर तक लातेहार से रिम्स, निजी अस्पतालों और सदर अस्पताल के चक्कर लगाता रहा।

चिकित्सक, अधिकारी फोटो शूट कराने में व्यस्त

सदर अस्पताल प्रबंधन की संवेदनहीनता का आलम यह था कि चिकित्सा अधिकारी नेत्र जांच वाहन का उद्घाटन और उसे रवाना करने में व्यस्त थे. जबकि गंभीर रूप से बीमार मरीज़ दोपहर 1:30 बजे से एम्बुलेंस में सलाइन पर था. उसकी पत्नी सलाइन की एक बोतल पकड़े हुए थी. इस दौरान मरीज एम्बुलेंस में ही बेड के इंतजार में लेटा रहा. एक घंटे बाद, काफी मिन्नतों के बाद, दो कर्मचारी ऑक्सीजन सिलेंडर और स्ट्रेचर लेकर आए और उन्हें अंदर ले गए. लेकिन किसी डॉक्टर ने उनकी देखभाल नहीं की. आखिरकार, ढाई घंटे बाद मरीज की मौत हो गई.

मरीज के बेटे आशीष ने बताया कि 7 अक्टूबर को वह अपने पिता के साथ शाम 4 बजे लातेहार से रिम्स पहुँचा. वहां कोई बेड खाली नहीं था, इसलिए उसे सदर अस्पताल भेज दिया गया. सदर अस्पताल में डॉक्टरों ने कहा कि उसे सामान्य निमोनिया है और वह ठीक हो जाएगा. आशीष फिर लातेहार लौट आया. 8 अक्टूबर को वह अपने पिता को फिर सदर अस्पताल लाया, लेकिन उसे भर्ती नहीं किया गया. फिर शाम 5 बजे वह अपने पिता को एक निजी अस्पताल ले गया. वहां के डॉक्टर ने उसकी हालत गंभीर बताई और उसे एक बड़े अस्पताल में ले जाने का निर्देश दिया.

इधर जिले के सिविल सर्जन ने जांच की बात की है परन्तु ये सिर्फ कागजी खाना पूर्ति बनकर रह जाएगी।क्योंकि संवेदनहीनता तो सबकी है मतलब साफ हैं कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था भगवान भरोसे हैं।क्योंकि यहां मरीज की जान की कीमत फोटो शूट कराने से कम है।

 

Hpbl Desk

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