दिवाली के अगले दिन यहां लगती है सांपों की रहस्यमयी अदालत! नागराज खुद बताते हैं आखिर क्यों काटा था, 100 साल पुरानी परंपरा जानकर रह जाएंगे हैरान
मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के लसूडिया परिहार गांव में दीपावली के अगले दिन एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। यहां बाबा मंगलदास के मंदिर में इंसानों की नहीं, बल्कि सांपों की अदालत लगती है। मान्यता है कि जिन लोगों को सालभर में सांप ने काटा होता है, उनके शरीर में नाग देवता की उपस्थिति होती है और वे खुद डसने की वजह बताते हैं। करीब 100 साल से चली आ रही इस परंपरा को देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

सीहोर। भारत में धर्म और आस्था से जुड़ी ऐसी कई परंपराएं हैं, जिनके बारे में जानकर लोग हैरान रह जाते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी सदियों पुरानी मान्यताओं और रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में भी ऐसी ही एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है, जहां दिवाली के अगले दिन सांपों की अदालत लगाई जाती है। हैरानी की बात यह है कि इस अदालत में इंसानों की तरह सांपों से सवाल-जवाब किए जाने की मान्यता है। कहा जाता है कि जिन लोगों को सांप ने काटा होता है, वे इस विशेष आयोजन में पहुंचते हैं और धार्मिक अनुष्ठान के दौरान उनके शरीर में नाग देवता की उपस्थिति महसूस होने लगती है।
यह अनोखी परंपरा सीहोर जिले के लसूडिया परिहार गांव स्थित बाबा मंगलदास के मंदिर में निभाई जाती है। दीपावली की पड़वा यानी अगले दिन यहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। मान्यता है कि सालभर में जिन महिला-पुरुषों को सांप ने काटा होता है, उन्हें इस विशेष आयोजन में शामिल होना पड़ता है। यहां एक-एक करके सर्पदंश पीड़ितों को पुजारी के सामने लाया जाता है और उनसे सांप के काटने की वजह पूछी जाती है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि उस समय पीड़ित के शरीर में वही नाग उपस्थित होता है, जिसने उसे डसा था।
सांप की आकृति वाली थाली बजते ही शुरू होता है अनोखा अनुष्ठान
इस पूरी परंपरा की शुरुआत विशेष पूजा-पाठ और अनुष्ठान से होती है। मंदिर में एक ऐसी थाली रखी जाती है, जिस पर सांप की आकृति बनी होती है। जब इस थाली को नगाड़े की तरह बजाया जाता है और पुजारी मंत्रोच्चार शुरू करते हैं, तो वहां मौजूद सर्पदंश पीड़ितों पर इसका असर दिखाई देने की मान्यता है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, कुछ लोगों के शरीर में विशेष तरह की हलचल होने लगती है और वे अलग-अलग तरीके से अपनी बात रखने लगते हैं। श्रद्धालु इसे नाग देवता की उपस्थिति से जोड़कर देखते हैं। इसके बाद पुजारी उनसे सवाल करते हैं कि आखिर उन्होंने संबंधित व्यक्ति को क्यों काटा था। मान्यता है कि इस दौरान नाग खुद डसने की वजह बताते हैं। यही वजह है कि इस आयोजन को सांपों की अदालत कहा जाता है।
सालभर में सांप काटे लोगों को आना पड़ता है मंदिर
इस परंपरा में शामिल होने वाले लोगों के लिए कुछ विशेष धार्मिक प्रक्रियाएं भी निभाई जाती हैं। मान्यता के अनुसार, जिन लोगों को सालभर में कभी भी सांप ने काटा होता है, उन्हें दीपावली की पड़वा पर मंदिर पहुंचना होता है। यहां पुजारी विशेष मंत्रों का उच्चारण करते हैं और पीड़ितों के गले में बेल बांधने की धार्मिक प्रक्रिया की जाती है।
इसके अलावा सर्पदंश पीड़ितों को बंधेज नाम का धागा भी बांधा जाता है। बताया जाता है कि इस धागे को बांधने की परंपरा सालभर तक जारी रहती है और दीपावली के अगले दिन संबंधित महिला-पुरुषों को मंदिर में आयोजित विशेष पेशी में शामिल होना पड़ता है। इस दौरान पीड़ितों को एक-एक करके पुजारी के सामने लाया जाता है।
100 साल से ज्यादा पुरानी है सांपों की यह अदालत
लसूडिया परिहार गांव में लगने वाली इस अनोखी अदालत की परंपरा करीब 100 साल से भी ज्यादा पुरानी बताई जाती है। पीढ़ियों से लोग इस आयोजन को देखते और इसमें शामिल होते आ रहे हैं। स्थानीय श्रद्धालुओं का इस परंपरा के प्रति गहरा विश्वास है। हर साल दीपावली के अगले दिन मंदिर में लोगों की भीड़ जुटती है और धार्मिक अनुष्ठान पूरे किए जाते हैं।
इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि यहां सर्पदंश पीड़ितों के लिए निःशुल्क धार्मिक उपचार की व्यवस्था होने की बात कही जाती है। हालांकि, सांपों की अदालत और नाग देवता द्वारा डसने की वजह बताने से जुड़ी बातें स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और आस्था पर आधारित हैं, इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उपचार नहीं माना जाना चाहिए।
आस्था के साथ सेहत का ध्यान रखना भी जरूरी
यह परंपरा भले ही लोगों के लिए आस्था और कौतूहल का विषय हो, लेकिन सांप के काटने की स्थिति में किसी भी तरह की देरी जानलेवा साबित हो सकती है। सर्पदंश होने पर पीड़ित को तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाना चाहिए, जहां जरूरत के अनुसार एंटीवेनम और अन्य जरूरी चिकित्सा मिल सके। झाड़-फूंक, मंत्र या धागे के भरोसे इलाज में देरी करना खतरनाक हो सकता है।
सीहोर के लसूडिया परिहार गांव की यह परंपरा आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। एक तरफ नाग देवता की अदालत को लेकर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है, तो दूसरी तरफ इसकी अनोखी मान्यताएं लोगों के मन में कई सवाल भी पैदा करती हैं।









