हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: टीचर-स्टूडेंट का सहमति से शारीरिक संबंध यौन उत्पीड़न नहीं, हाईकोर्ट ने शिक्षक की बर्खास्तगी का आदेश किया रद्द, फैसले में कहा…
Major High Court decision: Consensual physical relationship between teacher and student is not sexual harassment; High Court cancels teacher's dismissal order, says in the decision...

Higcourt News : शिक्षक व छात्रा के यौन संबंध को लेकर हाईकोर्ट ने बहुत अहम सुनाया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि यदि शिक्षक और छात्रा के बीच रिश्ता आपसी सहमति से था, तो उसे यौन उत्पीड़न की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा आचरण शिक्षक के नैतिक दायित्वों के खिलाफ है और इसे मिसकंडक्ट माना जाएगा। ये अहम फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान सुनाया। कोर्ट ने 19 साल पुराने मामले में एमएनएनआईटी प्रयागराज के एक लेक्चरर की बर्खास्तगी को अत्यधिक सजा मानते हुए रद्द कर दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया है कि स्पष्ट किया है कि यदि किसी शिक्षक और उसकी छात्रा के बीच संबंध आपसी सहमति से थे, तो उसे यौन उत्पीड़न (सेक्शुअल हैरेसमेंट) नहीं कहा जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि शिक्षक से उच्च नैतिक आचरण की अपेक्षा की जाती है और छात्रा के साथ इस तरह का संबंध अनुचित और गलत है, जिसे मिसकंडक्ट की श्रेणी में रखा जाएगा।
पूरा मामला प्रयागराज स्थित मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MNNIT) से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने 19 साल पुराने मामले में दायर याचिका पर अपना फैसला दिया। साथ ही लेक्चरर की बर्खास्तगी को भी रद्द कर दिया। सुनवाई करते हुए जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने संस्थान द्वारा वर्ष 2006 में एक लेक्चरर को नौकरी से बर्खास्त करने के आदेश को निरस्त कर दिया।
जानिये क्या था पूरा मामला
याचिकाकर्ता लेक्चरर की नियुक्ति वर्ष 1999 में एमएनएनआईटी प्रयागराज के कंप्यूटर साइंस एवं इंजीनियरिंग विभाग में हुई थी। वर्ष 2003 में संस्थान की एक पूर्व छात्रा ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। छात्रा का आरोप था कि शिक्षक ने उसके छात्र जीवन के दौरान भावनात्मक और शारीरिक उत्पीड़न किया और जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए।
जांच और बर्खास्तगी की कार्रवाई
हालांकि, यह शिकायत उस समय दर्ज की गई, जब कथित घटनाओं को तीन वर्ष बीत चुके थे और शिक्षक की दूसरी महिला से सगाई हो चुकी थी। इस देरी को भी कोर्ट ने मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू माना। शिकायत के बाद एमएनएनआईटी प्रशासन ने पहले पांच सदस्यों की एक आंतरिक समिति गठित की। लेकिन समिति ने बलात्कार जैसे गंभीर आरोपों पर फैसला देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामले की जांच के लिए एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एकल जांच समिति बनाई गई।
जांच के दौरान शिक्षक ने यह स्वीकार किया कि छात्रा के साथ उनका संबंध था, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि यह रिश्ता पूरी तरह आपसी सहमति से था और छात्रा के संस्थान छोड़ने के बाद भी कुछ समय तक जारी रहा। इसके बावजूद, जांच रिपोर्ट के आधार पर 28 फरवरी 2006 को संस्थान ने उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया।
हाईकोर्ट में चुनौती और कोर्ट की टिप्पणी
बर्खास्तगी से आहत होकर लेक्चरर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जांच प्रक्रिया में उन्हें गवाहों से जिरह करने का मौका नहीं दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। इसके अलावा, उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट ने मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह प्रतीत होता है कि दोनों के बीच संबंध सहमति से थे। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायत तब सामने आई, जब दोनों के बीच विवाह की संभावना समाप्त हो गई थी।
बर्खास्तगी को बताया अत्यधिक सजा
जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने अपने 16 दिसंबर को दिए गए आदेश में कहा कि शिक्षक का छात्रा के साथ इस तरह का संबंध नैतिक रूप से गलत और अनुचित है, लेकिन इसे यौन उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि शिक्षक से उच्चतम नैतिक मानकों की अपेक्षा की जाती है, लेकिन इस मामले में वर्ष 2006 में दी गई बर्खास्तगी की सजा अत्यधिक और अनुपयुक्त थी।इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 19 साल पुरानी बर्खास्तगी को रद्द कर दिया।









