Marriage Case: ‘हम किसी धर्म को नहीं मानते’, शादी खत्म कराने पहुंची महिला; दो बार लौटी याचिका, हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला
महिला ने 2022 में हुई शादी को कानूनी तौर पर अमान्य घोषित करने की मांग की थी, लेकिन निचली अदालत ने अधिकार क्षेत्र का हवाला देकर याचिका लौटा दी थी। मद्रास हाईकोर्ट ने अब आदेश रद्द करते हुए याचिका स्वीकार कर कानून के मुताबिक सुनवाई के निर्देश दिए हैं।

मद्रास हाईकोर्ट ने ऐसे दंपति की शादी से जुड़े मामले में अहम कानूनी फैसला सुनाया है, जिन्होंने अपने विवाह के समय खुद को किसी धर्म से नहीं जोड़ने का विकल्प चुना था। महिला अपनी शादी को कानूनी तौर पर अमान्य घोषित कराने के लिए अदालत पहुंची थी, लेकिन उसकी याचिका को निचली अदालत ने दो बार वापस कर दिया। इसके बाद महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए याचिका स्वीकार करने और मामले की कानून के अनुसार सुनवाई करने का निर्देश दिया।
मामला 9 जून 2022 को हुई शादी से जुड़ा है। महिला के मुताबिक, इस विवाह को तमिलनाडु रजिस्ट्रेशन ऑफ मैरिज एक्ट, 2009 के तहत पंजीकृत किया गया था। विवाह के समय पति और पत्नी दोनों ने खुद को किसी धर्म से संबंधित नहीं बताया था। बाद में महिला ने अपनी शादी को अमान्य घोषित करने के लिए जिला मुंसिफ अदालत में याचिका दायर की।
पहली बार 2025 में लौटाई गई याचिका
महिला की याचिका पर 21 जुलाई 2025 को निचली अदालत ने उसे वापस कर दिया। इसके बाद महिला ने मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया। 4 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि महिला को ओपन कोर्ट में अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए और उसके बाद मामले के गुण-दोष के आधार पर उचित आदेश पारित किया जाए।
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद महिला एक बार फिर निचली अदालत पहुंची। हालांकि, 29 अप्रैल को अदालत ने उसकी याचिका दोबारा लौटा दी। इस बार निचली अदालत ने यह कहते हुए सुनवाई से इनकार किया कि उसके पास मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र नहीं है, क्योंकि संबंधित विवाह हिंदू मैरिज एक्ट के तहत नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट ने अधिकार क्षेत्र को लेकर क्या कहा?
जस्टिस एन आनंद वेंकटेश ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि इस तरह के विवाह को लेकर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच पहले ही स्थिति स्पष्ट कर चुकी है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे विवाह, जिनमें विवाह करने वाले पक्ष खुद को किसी धर्म से संबंधित नहीं बताते, वे हिंदू मैरिज एक्ट, स्पेशल मैरिज एक्ट या किसी अन्य धर्म-विशिष्ट विवाह कानून के दायरे में जरूरी तौर पर नहीं आते।
हाईकोर्ट ने पहले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों में वैवाहिक स्थिति से संबंधित घोषणा के लिए फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया जा सकता है। यानी केवल यह तथ्य कि विवाह किसी विशेष धार्मिक कानून के तहत नहीं हुआ है, अदालत को वैवाहिक स्थिति से जुड़े विवाद पर सुनवाई से रोकने का आधार नहीं बन सकता।
फैमिली कोर्ट को लेकर भी हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
अदालत ने फैमिली कोर्ट एक्ट के प्रावधानों पर भी गौर किया। हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत केवल किसी विशेष धर्म से जुड़े लोग ही इसके तहत उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
अदालत ने पहले के फैसले में की गई टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार फैमिली कोर्ट वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों के लिए मंच उपलब्ध कराता है। इसमें ऐसे मामले भी शामिल हो सकते हैं, जहां पक्षकारों के बीच उनकी वैवाहिक स्थिति को लेकर विवाद हो और वे किसी अन्य विवाह कानून के तहत राहत लेने की स्थिति में न हों।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
मद्रास हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया। उसमें कहा गया था कि विवाह की वैधता या वैवाहिक स्थिति को लेकर घोषणा की मांग करने वाली कार्यवाही फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आ सकती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि याचिका में मांगी गई राहत सकारात्मक घोषणा के रूप में हो या नकारात्मक घोषणा के रूप में, इससे फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर फर्क नहीं पड़ता।
इन्हीं कानूनी स्थितियों को ध्यान में रखते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि महिला की याचिका को केवल इस आधार पर वापस नहीं किया जा सकता कि उसका विवाह हिंदू रीति-रिवाजों या हिंदू मैरिज एक्ट के तहत नहीं हुआ था।
29 अप्रैल का आदेश रद्द, याचिका स्वीकार करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 29 अप्रैल के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही जिला मुंसिफ अदालत को निर्देश दिया कि वह महिला की याचिका को स्वीकार करे, उसे नंबर दे और मामले में कानून के अनुसार आगे की कार्यवाही करे।
कोर्ट की रजिस्ट्री को महिला की मूल याचिका वापस करने का भी निर्देश दिया गया है, ताकि वह उसे निचली अदालत में दोबारा पेश कर अपनी मांगी गई कानूनी राहत के लिए कार्यवाही आगे बढ़ा सके। इसके लिए 12 अक्टूबर तक याचिका पेश करने का निर्देश दिया गया है।
हाईकोर्ट ने इन निर्देशों के साथ महिला की रिवीजन याचिका मंजूर कर ली। हालांकि, मामले में लागत को लेकर अदालत ने कोई आदेश जारी नहीं किया।









