IDBI बैंक की हिस्सेदारी बेचने पर सियासी घमासान, राहुल गांधी बोले- मैं कर्मचारियों के साथ खड़ा हूं, सरकार के फैसले पर उठाए सवाल
केंद्र के विनिवेश कदम को लेकर बैंक कर्मचारियों और यूनियनों में नाराजगी, राहुल ने कांग्रेस और मोदी सरकार के कार्यकाल की नीतियों की तुलना की; केंद्र ने बताया रणनीतिक पुनर्गठन का हिस्सा

नई दिल्ली। आईडीबीआई बैंक में सरकार की हिस्सेदारी बेचने के फैसले को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने शुक्रवार को बैंक के कर्मचारियों के समर्थन में आवाज उठाते हुए केंद्र सरकार के विनिवेश कदम पर सवाल खड़े किए। बैंक यूनियनों और कुछ राजनीतिक दलों की ओर से भी सरकार के फैसले का विरोध किया जा रहा है। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर आईडीबीआई बैंक परिवार के नाम एक पत्र साझा करते हुए कहा कि वह बैंक के कर्मचारियों के साथ खड़े हैं।
राहुल गांधी ने अपने संदेश में कांग्रेस और मौजूदा केंद्र सरकार के कार्यकाल की तुलना करते हुए बैंक की स्थापना और उसकी हिस्सेदारी बेचने के फैसले पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में देश के उद्योगों को मजबूत बनाने के उद्देश्य से आईडीबीआई की स्थापना की गई थी, जबकि मौजूदा सरकार के दौर में बैंक की हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
राहुल गांधी बोले- कांग्रेस के समय बैंक बनाए गए, अब बेचे जा रहे
आईडीबीआई बैंक कर्मचारियों के नाम अपने पत्र में राहुल गांधी ने कहा, “कांग्रेस के समय में देश के उद्योगों को खड़ा करने के लिए आईडीबीआई की स्थापना की गई थी। वहीं मोदी के समय में पहले बोलियां मंगवाई गईं और फिर कीमत तय कर दी गई। कांग्रेस के समय में बैंक बनाए जा रहे थे, जबकि मोदी के समय में उन्हें बेचा जा रहा है। मैं आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों के साथ खड़ा हूं।”
राहुल गांधी के इस बयान के बाद बैंक के विनिवेश को लेकर राजनीतिक चर्चा फिर तेज हो गई है। कर्मचारियों और बैंक यूनियनों की चिंताओं के बीच विपक्ष ने सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग उठाई है।
सरकार ने बताया रणनीतिक पुनर्गठन का हिस्सा
दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने आईडीबीआई बैंक में अपनी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया का बचाव किया है। सरकार का कहना है कि यह कदम बैंक के रणनीतिक पुनर्गठन का हिस्सा है और पूरी प्रक्रिया रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल यानी RFP में निर्धारित शर्तों के अनुसार आगे बढ़ाई जा रही है। सरकार के मुताबिक, इस प्रक्रिया को सचिवों के एक पैनल और आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति की मंजूरी के बाद शुरू किया गया था।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया में मूल्यांकन और बोली से जुड़े तय मानकों का पालन किया गया है। अधिकारियों के अनुसार, रणनीतिक विनिवेश जैसे जटिल सौदों में प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए कुछ स्तर तक लचीलापन जरूरी होता है।
पहले भी अटक चुकी है विनिवेश की प्रक्रिया
आईडीबीआई बैंक के विनिवेश की प्रक्रिया इससे पहले भी मुश्किलों का सामना कर चुकी है। इस साल की शुरुआत में मिली बोलियां सरकार की तय रिजर्व प्राइस से काफी कम थीं। इसके चलते उस समय विनिवेश प्रक्रिया को रद्द करना पड़ा था। इसके बाद सरकार ने प्रक्रिया में शामिल दो कंपनियों से दोबारा बोलियां मंगवाईं।
सरकार ने फेयरफैक्स होल्डिंग्स को हिस्सेदारी बेचने से जुड़े फैसले से पहले मूल्यांकन के दो तरीकों का इस्तेमाल किया। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों और मूल्यांकन को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
सरकार ने कहा- दिशानिर्देशों में बदलाव की गुंजाइश थी
केंद्र सरकार ने अपने बयान में कहा कि प्रक्रिया का पहला चरण आंतरिक कार्यप्रणालियों के तहत पूरा किया गया था। ये कार्यप्रणालियां संकेतात्मक दिशानिर्देश थीं, न कि ऐसे कठोर नियम या कानूनी प्रावधान जिनमें किसी बदलाव की गुंजाइश न हो।
सरकार के मुताबिक, प्रस्ताव में शुरुआत से ही स्पष्ट किया गया था कि सुझाई गई प्रक्रिया को कठोर कानूनी ढांचे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। रणनीतिक लेन-देन की जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए जरूरत पड़ने पर उचित बदलाव किए जा सकते हैं, ताकि प्रक्रिया को समय पर पूरा किया जा सके और अनावश्यक देरी से बचा जा सके।
आईडीबीआई बैंक के भविष्य को लेकर बहस तेज
आईडीबीआई बैंक में सरकारी हिस्सेदारी बेचने के फैसले ने एक बार फिर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के भविष्य और विनिवेश की नीति पर बहस छेड़ दी है। एक तरफ सरकार इसे रणनीतिक पुनर्गठन और तय प्रक्रिया के तहत उठाया गया कदम बता रही है, वहीं बैंक कर्मचारियों और विपक्ष की ओर से इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। अब इस मुद्दे पर आगे सरकार का रुख और कर्मचारियों की प्रतिक्रिया राजनीतिक बहस की दिशा तय करेगी।









