Supreme Court: 25 साल पुराने बकाया विवाद पर बड़ा फैसला, झारखंड-बिहार के दैनिक वेतनभोगियों को मिलेंगे अतिरिक्त 1 लाख रुपये
सुप्रीम कोर्ट ने पांच बंद सरकारी निगमों के पात्र कामगारों के लिए तय की अतिरिक्त राशि, EPF बकाया पर 12% और वेतन-मजदूरी समेत अन्य देयों पर 6% ब्याज देने का भी आदेश
रांची। बिहार के पुनर्गठन और झारखंड के गठन के बाद से चले आ रहे कर्मचारियों के बकाया भुगतान के करीब 25 साल पुराने विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने अहम आदेश दिया है। कोर्ट ने बिहार और झारखंड की पांच बंद सरकारी निगमों से जुड़े पात्र दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों और कामगारों को पहले से निर्धारित और भुगतान की गई राशि के अतिरिक्त एकमुश्त 1 लाख रुपये देने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही विलंबित ईपीएफ बकाया पर 12 प्रतिशत साधारण ब्याज और वेतन, मजदूरी तथा अन्य मौद्रिक देयों पर 6 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश दिया गया है। यह आदेश 28 सितंबर 2026 को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दिया।
यह विवाद बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के बाद दोनों राज्यों के बीच सरकारी निगमों की देनदारियों के बंटवारे और कर्मचारियों के वेतन तथा अन्य सेवा संबंधी बकाया को लेकर शुरू हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में मामले को लंबे समय से चले आ रहे विवाद के रूप में देखते हुए शेष दावों के निपटारे के लिए विस्तृत निर्देश जारी किए हैं।
पांच बंद सरकारी निगमों के कर्मचारियों से जुड़ा है मामला
मामला पांच अंतरराज्यीय सरकारी निगमों के पूर्व कर्मचारियों और कामगारों के बकाया भुगतान से संबंधित है। इनमें बिहार स्टेट कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन लिमिटेड, बिहार स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड, बिहार स्टेट इलेक्ट्रॉनिक डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड, बिहार स्टेट फॉरेस्ट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड और बिहार स्टेट पंचायती राज फाइनेंशियल कॉरपोरेशन लिमिटेड शामिल हैं। इन निगमों के बंद हो जाने के बाद भी बड़ी संख्या में कर्मचारियों के वेतन, मजदूरी, सेवानिवृत्ति लाभ और अन्य देयकों का विवाद लंबित रहा।
दैनिक वेतनभोगियों को अब अतिरिक्त 1 लाख रुपये
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित अवधि में इन निगमों में कार्यरत पात्र दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों और कामगारों को पहले से निर्धारित और वितरित राशि के अतिरिक्त एकमुश्त 1 लाख रुपये दिए जाएंगे। कोर्ट ने यह राशि लंबे समय से चले आ रहे विवाद को समाप्त करने और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के दावों के निपटारे के हिस्से के रूप में निर्धारित की है।
सुनवाई के दौरान कामगारों की मजदूरी की गणना को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल उठा। राज्यों की ओर से कुछ मामलों में लंबे समय तक पुरानी दैनिक मजदूरी दर के आधार पर देनदारी तय करने की बात सामने आई थी। कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया और कहा कि केवल दैनिक वेतनभोगी होने के आधार पर वर्षों तक मजदूरी को एक ही दर पर स्थिर नहीं माना जा सकता।
2,274 सत्यापित कर्मचारियों में 2,074 को भुगतान
सुप्रीम कोर्ट को दी गई जानकारी के मुताबिक कुल 2,274 सत्यापित कर्मचारियों और कामगारों में से 2,074 को मूल देय राशि का भुगतान किया जा चुका है। करीब 200 मामले अभी लंबित हैं। इनमें ऐसे मामले शामिल हैं, जहां संबंधित कर्मचारी या उनके कानूनी वारिसों का पता नहीं चल पाया अथवा आवश्यक दस्तावेज और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस वजह से ऐसे कर्मचारियों या उनके कानूनी वारिसों का मूल दावा समाप्त नहीं होगा कि फिलहाल उनका सत्यापन नहीं हो पाया है।
अब भी दावा करने वालों को मिलेगा 12 महीने का मौका
जिन कर्मचारियों या उनके कानूनी वारिसों का अभी तक सत्यापन नहीं हुआ है, उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने 12 महीने का अवसर दिया है। वे संबंधित निगम के नोडल अधिकारी से संपर्क कर आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध करा सकते हैं। सत्यापन के बाद जो राशि कानून के अनुसार देय पाई जाएगी, उसका भुगतान किया जाएगा।
इसका मतलब यह है कि सत्यापन न होने के कारण लंबित दावों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया है। पात्र कर्मचारी या उनके कानूनी वारिस निर्धारित अवधि में जरूरी दस्तावेजों के साथ अपना दावा आगे बढ़ा सकते हैं।
EPF पर 12% और वेतन समेत अन्य देयों पर 6% ब्याज
सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से लंबित भुगतान पर ब्याज को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं। आदेश के अनुसार विलंबित EPF देयों पर 12 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज देना होगा। वहीं वेतन, मजदूरी और अन्य मौद्रिक देयों पर 6 प्रतिशत सालाना ब्याज दिया जाएगा। ब्याज की गणना उस तारीख से की जाएगी, जब संबंधित राशि देय हुई थी, और वास्तविक भुगतान की तारीख तक की जाएगी।
कोर्ट ने राज्यों को इस ब्याज की गणना और भुगतान की प्रक्रिया निर्धारित समय में पूरी करने के निर्देश भी दिए हैं।
चार सप्ताह में वेबसाइट पर देनी होगी जानकारी
पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बिहार और झारखंड सरकारों को कर्मचारियों और कामगारों से संबंधित अद्यतन जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया है। संबंधित विवरण वेबसाइट पर उपलब्ध कराने होंगे, ताकि भुगतान की स्थिति और लंबित मामलों की जानकारी सामने रह सके।
अदालत के निर्देशों के अनुसार भुगतान प्राप्त करने वाले कर्मचारियों की जानकारी के साथ लंबित मामलों की स्थिति और संबंधित प्रक्रिया की जानकारी भी सार्वजनिक की जानी है।
25 साल से चल रहा था बकाया भुगतान का विवाद
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी इस मामले में दोनों राज्यों के बीच देनदारियों के बंटवारे और कर्मचारियों के बकाया भुगतान को लेकर कई निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट के मार्च 2025 के आदेश में भी यह दर्ज किया गया था कि पुनर्गठन के करीब 25 साल बाद तक पांच निगमों के पूर्व कर्मचारियों के वेतन और अन्य दावे पूरी तरह निपट नहीं पाए थे।
29 मई 2026 के आदेश के बाद बिहार और झारखंड ने अनुपालन संबंधी जानकारी अदालत के सामने रखी। इसके बाद 28 सितंबर के आदेश में दैनिक वेतनभोगियों की अतिरिक्त राशि, बकाया पर ब्याज और अब तक सत्यापित नहीं हो पाए दावों के संबंध में विस्तृत निर्देश दिए गए।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से संबंधित पांच बंद सरकारी निगमों के पात्र दैनिक वेतनभोगी कामगारों और पूर्व कर्मचारियों के लंबित भुगतान के निपटारे की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ है। हालांकि, प्रत्येक कर्मचारी को मिलने वाली वास्तविक राशि उसकी पात्रता, पूर्व निर्धारित देय राशि और संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर तय होगी।









