झारखंड भवन में सिर्फ विधायक के नाते-रिश्तेदार को ठहरने की इजाजत, सदन में जारी सर्कुलर पर विवाद गहराया, सरकार ने दिया ये जवाब

Only relatives of MLAs are allowed to stay at Jharkhand Bhawan, a controversy has erupted over the circular issued in the House, and the government has responded.

रांची। झारखंड विधानसभा में झारखंड भवन, दिल्ली में आवास आवंटन को लेकर नया विवाद सामने आया। भाजपा विधायक बाबूलाल मरांडी ने मंत्रिमंडल सचिवालय एवं निगरानी विभाग द्वारा जारी नए सर्कुलर को अव्यावहारिक बताते हुए उसके तुरंत निरस्तीकरण की मांग की। सरकार ने इस मामले की गंभीरता स्वीकार करते हुए जांच व समीक्षा का आश्वासन दिया।

 

बाबूलाल मरांडी ने दिल्ली बताया कि मंत्रिमंडल सचिवालय एवं निगरानी विभाग द्वारा जारी ताज़ा सर्कुलर के अनुसार अब केवल विधायक के “सगे संबंधियों” को ही झारखंड भवन में ठहरने की अनुमति दी गई है।मरांडी के अनुसार, यह नियम प्रशासनिक अधिकारियों के परिवारों पर तो शायद लागू हो सकता है, लेकिन जनप्रतिनिधियों पर इसे लागू करना व्यावहारिक नहीं है।

 

उन्होंने कहा कि एक विधायक को जनता लाखों वोट देकर चुनती है और कई बार उनके क्षेत्र के महत्वपूर्ण लोग, सामाजिक प्रतिनिधि या कतिपय आपात परिस्थितियों में उनके द्वारा भेजे गए नागरिकों को दिल्ली जाकर ठहरने की आवश्यकता होती है। ऐसे में ‘सगे संबंधी’ की परिभाषा में बंधकर जनप्रतिनिधियों की भूमिका सीमित हो जाएगी।

 

“यह आदेश जनप्रतिनिधियों के हित में नहीं” – मरांडी

मरांडी ने उदाहरण देते हुए बताया कि हाल ही में जब उन्होंने झारखंड भवन बुक कराने का प्रयास किया तो उन्हें बताया गया कि नियम बदल दिए गए हैं और अब केवल पति-पत्नी, माता-पिता, बच्चे और साले-साली जैसे सगे रिश्तेदार ही ठहर सकते हैं।

उन्होंने सदन को यह भी अवगत कराया कि पहले स्वयं कांग्रेस विधायक रामेश्वर उरांव ने भी अपने परिचितों— आलोक दुबे और लाल किशोर नाथ शाहदेव—के लिए झारखंड भवन में जगह बुक कराई थी।उन्होंने तर्क दिया कि जनप्रतिनिधियों के लिए ऐसी कठोर शर्तें लागू करना उचित नहीं है, क्योंकि उनकी जिम्मेदारियाँ कहीं अधिक व्यापक होती हैं।

 

ऊर्जा विभाग के गेस्ट हाउस पर भी उठे सवाल

चर्चा के दौरान मरांडी ने दिल्ली स्थित ऊर्जा विभाग के गेस्ट हाउस पर भी सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि इस गेस्ट हाउस के लिए प्रतिमाह लगभग 5 लाख रुपये खर्च होते हैं, लेकिन यह साफ नहीं है कि वहां वास्तविक रूप से कौन ठहरता है। उन्होंने मांग की कि पिछले पाँच वर्षों की पूरी सूची सदन में प्रस्तुत की जाए, जिससे यह पता चले कि वहां किसकी अनुशंसा पर कौन-कौन ठहरा है।मरांडी ने कहा कि यह जनता के पैसे का दुरुपयोग है और उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों व संबंधित विभागों पर कार्रवाई होनी चाहिए।

 

सरकार ने माना—मुद्दा गंभीर है

संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने बाबूलाल मरांडी की बातों से सहमति जताते हुए कहा कि यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और सरकार इस पर गंभीरता से विचार करेगी। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधि जनता के प्रतिनिधि हैं और उनकी अनुशंसा का सम्मान होना चाहिए। मंत्री ने संकेत दिया कि बिना कैबिनेट स्वीकृति के इस प्रकार के नियम लागू नहीं किए जाने चाहिए।उन्होंने आश्वासन दिया कि सरकार इस सर्कुलर की समीक्षा करेगी और आवश्यक होने पर जांच भी कराई जाएगी।

ashrita

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