दहेज ही नहीं, किसी भी तरह से पैसों की मांग पर पत्नी को प्रताड़ित करना भी क्रूरता: हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
झारखंड हाई कोर्ट ने 498A मामले में अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अवैध पैसे या संपत्ति की मांग के लिए पत्नी को प्रताड़ित करना भी क्रूरता हो सकती है।

रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत मामला बनने के लिए यह जरूरी नहीं कि महिला से की गई पैसों या संपत्ति की मांग को सीधे तौर पर ‘दहेज’ कहा जाए। यदि किसी गैरकानूनी मांग को पूरा कराने के लिए महिला को मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना दी जाती है, तो वह भी वैधानिक रूप से क्रूरता के दायरे में आ सकती है।
जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने पूर्वी सिंहभूम की रहने वाली अनीता भकत की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने निचली अपीलीय अदालत द्वारा पति और ससुराल पक्ष के तीन लोगों को बरी किए जाने के निर्णय को निरस्त कर दिया। साथ ही ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई दोषसिद्धि को बहाल कर दिया।
कारोबार के नाम पर मायके से मांगे गए थे रुपये
मामले की शुरुआत अनीता भकत की शादी से जुड़ी परिस्थितियों से हुई। विवाह के बाद उसके मायके पक्ष की ओर से नकद राशि, आभूषण और घरेलू सामान दिए गए थे। आरोप था कि शादी के बाद पति ने चावल के कारोबार के लिए मशीन खरीदने की बात कहते हुए मायके से अतिरिक्त रकम लाने का दबाव बनाया।
अनीता का आरोप था कि मांग पूरी नहीं होने पर उसके साथ दुर्व्यवहार और मारपीट की गई। यहां तक कि गर्भावस्था के दौरान भी उसे कथित तौर पर शारीरिक और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ी। बाद में दोबारा रकम लाने का दबाव बनाया गया और मांग पूरी न होने पर उसे धमकी देकर घर से निकालने का आरोप लगाया गया। इसके बाद महिला ने पुलिस में शिकायत की और न्यायालय की शरण ली।
अपील में बरी हो गए थे आरोपी
मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने पति और ससुराल पक्ष के आरोपितों को धारा 498ए सहित अन्य धाराओं में दोषी माना था। हालांकि, अपीलीय अदालत ने इस फैसले को पलटते हुए आरोपितों को बरी कर दिया था।अपीलीय अदालत की ओर से यह तर्क दिया गया था कि मांगी गई रकम कारोबारी जरूरत के लिए थी। इसलिए उसे दहेज की मांग के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
हाई कोर्ट ने दहेज की परिभाषा तक मामला सीमित नहीं माना
हाई कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि धारा 498ए का दायरा सिर्फ उस स्थिति तक सीमित नहीं है, जहां मांग को स्पष्ट रूप से दहेज कहा गया हो। किसी महिला से अवैध संपत्ति या पैसे की मांग करना और उस मांग को पूरा कराने के लिए उसे प्रताड़ित करना भी क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है।
अदालत ने मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए माना कि महिला से की गई रकम की मांग गैरकानूनी थी और उसे पूरा कराने के लिए उसके साथ कथित तौर पर शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना की गई।
ट्रायल कोर्ट का फैसला फिर बहाल
हाई कोर्ट ने अपीलीय अदालत के बरी करने वाले आदेश को रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि बहाल कर दी। अदालत ने पति समेत तीनों आरोपितों को दो महीने के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आरोपित निर्धारित अवधि में सरेंडर नहीं करते हैं, तो ट्रायल कोर्ट उनकी गिरफ्तारी और आगे की कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित कर सकता है।
फैसले का क्या है महत्व?
हाई कोर्ट की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण इसलिए मानी जा रही है क्योंकि इसमें दहेज प्रताड़ना के मामलों को केवल पारंपरिक दहेज की मांग तक सीमित नहीं रखा गया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि महिला को किसी भी अवैध आर्थिक या संपत्ति संबंधी मांग के लिए दबाव में रखना और प्रताड़ित करना, परिस्थितियों के आधार पर धारा 498ए के तहत क्रूरता माना जा सकता है।
दहेज देने या लेने पर क्या है सजा?
‘दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961’ के तहत दहेज देना या दहज लेना एक दंडनीय अपराध है। ऐसी स्थिति में आरोपी को कम से कम पांच साल की जेल की सजा सुनाई जाएगी और साथ में आर्थिक जुर्माना भी लगाया जाएगा जिसकी कीमत कम से कम 15 हजार रुपये होगी; इस जुर्माने की रकम दहेज की रकम जितनी भी हो सकती है।
‘दहेज हत्या’ को लेकर कानून
भारतीय दंड संहिता की धारा 304B (Section 304B of Indian Penal Code) ‘दहेज हत्या’ (Dowry Death) पर है। इस धारा के तहत यदि किसी महिला की हत्या शारीरिक चोट या जलने की वजह से, शादी के सात साल के अंदर होती है और यह दिखाया जा सकता है कि हत्या से कुछ समय पहले उसे दहेज की मांग की वजह से, अपने पति या पति के किसी रिश्तेदार से क्रूरता या शोषण का सामना करना पड़ा, तो इस तरह की हत्या को ‘दहेज हत्या’ कहा जाएगा।
ऐसे में, यह कहा जा सकता है कि उस विवाहित महिला के देहांत का जिम्मेदार उसका पति या फिर उसके पति का कोई रिश्तेदार है।
‘डाउरी डेथ’ के जिम्मेदार शख्स को कम से कम सात साल की जेल की सजा सुनाई जाएगी जो बढ़ाकर आजीवन कारावास तक भी की जा सकती है। दहेज की मांग नहीं, फिर भी 498A का केस! झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, आरोपियों को सरेंडर का आदेश









