Kidney Failure Symptoms: शरीर में चुपचाप बढ़ती रहती है किडनी की बीमारी, पैर में सूजन से लेकर बेहोशी जैसे लक्षण को नजरअंदाज किया तो देर हो सकती है

नई दिल्ली। किडनी की बीमारी को अक्सर इसलिए खतरनाक माना जाता है क्योंकि शुरुआती दौर में इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। व्यक्ति सामान्य थकान, पैरों में सूजन या पेशाब में बदलाव जैसी समस्याओं को मामूली समझकर नजरअंदाज कर सकता है। कई मामलों में बीमारी का पता तब चलता है, जब किडनी की कार्यक्षमता काफी प्रभावित हो चुकी होती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, कुछ शारीरिक बदलाव ऐसे हैं जिन्हें लगातार बने रहने पर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर समय रहते जांच कराने से बीमारी का पता लगाने और उसे मैनेज करने में मदद मिल सकती है।
क्या होता है किडनी फेलियर?
किडनी शरीर से अपशिष्ट पदार्थ और अतिरिक्त पानी बाहर निकालने के साथ-साथ ब्लड प्रेशर, पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अलावा, किडनी ऐसे हार्मोन से जुड़े काम में भी योगदान देती है जो लाल रक्त कोशिकाओं और हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं।
क्रोनिक किडनी डिजीज धीरे-धीरे बढ़ सकती है और शुरुआती चरणों में इसके लक्षण बहुत कम या बिल्कुल नहीं दिख सकते हैं। इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर बीमारी की गंभीरता का पता लगाना संभव नहीं होता। इसके लिए ब्लड और यूरिन टेस्ट जरूरी होते हैं।
किडनी की बीमारी की 5 स्टेज
किडनी की कार्यक्षमता को आमतौर पर eGFR के आधार पर अलग-अलग स्टेज में समझा जाता है।
स्टेज 1 और 2: किडनी में नुकसान के संकेत हो सकते हैं, लेकिन आमतौर पर स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते।
स्टेज 3: किडनी की कार्यक्षमता कम होने के साथ ब्लड टेस्ट में बदलाव और कुछ लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
स्टेज 4: किडनी की कार्यक्षमता काफी कम हो जाती है और डॉक्टर की निगरानी में उपचार की जरूरत बढ़ जाती है।
स्टेज 5: किडनी की गंभीर विफलता की स्थिति होती है, जिसमें कुछ मरीजों को डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है।
पैरों में सूजन से पेशाब में बदलाव तक, इन संकेतों पर दें ध्यान
किडनी की बीमारी बढ़ने पर शरीर में कई तरह के बदलाव दिखाई दे सकते हैं। इनमें शामिल हैं:
- ब्लड प्रेशर का अचानक बढ़ना या पहले नियंत्रित रहने वाला BP दवाओं के बावजूद काबू में न आना
- पेशाब में झाग दिखाई देना
- पेशाब में खून आना
- पेशाब की मात्रा कम होना
- रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना
- पैरों, टखनों या आंखों के आसपास सूजन
इनमें से कोई लक्षण दिखने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को निश्चित रूप से किडनी फेलियर है। लेकिन अगर लक्षण लगातार बने रहें या दूसरे लक्षणों के साथ दिखाई दें, तो चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है।
बीमारी बढ़ने पर दिख सकते हैं ये लक्षण
किडनी की कार्यक्षमता ज्यादा प्रभावित होने पर लगातार थकान, कमजोरी, जी मिचलाना, भूख कम लगना, त्वचा में रूखापन और खुजली जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कुछ लोगों को मुंह में धातु जैसा स्वाद भी महसूस हो सकता है।
गंभीर स्थिति में भ्रम, अत्यधिक कमजोरी या चेतना में बदलाव जैसे लक्षण भी हो सकते हैं। ऐसे लक्षणों में तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है।
कौन लोग ज्यादा जोखिम में हैं?
कुछ स्वास्थ्य स्थितियों में क्रोनिक किडनी डिजीज का खतरा बढ़ सकता है। इनमें प्रमुख रूप से डायबिटीज और लंबे समय तक अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर शामिल हैं। इसके अलावा परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास, बार-बार किडनी स्टोन या यूरिनरी इंफेक्शन जैसी समस्याएं भी जोखिम बढ़ा सकती हैं।
कुछ दर्द निवारक दवाओं का लंबे समय तक या अधिक मात्रा में इस्तेमाल भी किडनी के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए ऐसी दवाओं का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए।
तीन जांचों से मिल सकती है अहम जानकारी
किडनी की कार्यक्षमता की जांच के लिए डॉक्टर जरूरत के अनुसार सीरम क्रिएटिनिन, eGFR और यूरिन में प्रोटीन जैसी जांच करवाने की सलाह दे सकते हैं। खासतौर पर डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या अन्य जोखिम वाले लोगों के लिए नियमित जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।
किडनी की बीमारी अगर शुरुआती चरण में पकड़ में आ जाए तो उसके बढ़ने की रफ्तार को कम करने और जटिलताओं को नियंत्रित करने के लिए उपचार किया जा सकता है। वहीं, बीमारी के गंभीर चरण में उपचार अधिक जटिल हो सकता है।
इसलिए लगातार सूजन, पेशाब में बदलाव, असामान्य थकान या अन्य चिंताजनक लक्षणों को केवल सामान्य कमजोरी समझकर टालना ठीक नहीं है। सही कारण जानने के लिए डॉक्टर से सलाह और आवश्यक जांच कराना सबसे जरूरी कदम है।









