अपराधी हजारों किलोमीटर दूर बैठकर कर रहे वारदात, अब झारखंड पुलिस भी हुई हाईटेक! 1000 से ज्यादा अफसरों की ट्रेनिंग पूरी, 12 अक्टूबर से फिर चलेगा बड़ा अभियान
वैज्ञानिक और तकनीकी तरीके से जांच पर जोर, ASI से DSP तक अधिकारियों को मिल रही आधुनिक अनुसंधान की ट्रेनिंग; होटवार में ऑफलाइन और ऑनलाइन होगा अगला प्रशिक्षण

रांची। अपराध का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब अपराधी जरूरी नहीं कि वारदात की जगह पर मौजूद हों। तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच अपराधी हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी साइबर और दूसरे तरीकों से अपराध को अंजाम दे रहे हैं। ऐसे बदलते अपराध के दौर में झारखंड पुलिस भी खुद को हाईटेक बनाने में जुटी है। पुलिस अधिकारियों को अब अनुसंधान के वैज्ञानिक और तकनीकी पहलुओं की विशेष ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि आधुनिक अपराधों की जांच ज्यादा प्रभावी और वैज्ञानिक तरीके से की जा सके।
इसी दिशा में केंद्रीय जांच एजेंसियों के विशेषज्ञों की मदद से झारखंड पुलिस के 1000 से अधिक ASI, दारोगा, इंस्पेक्टर और DSP स्तर के अधिकारियों को अब तक प्रशिक्षित किया जा चुका है। प्रशिक्षण का फोकस इस बात पर है कि बदलते अपराध के मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्यों को कैसे जुटाया जाए, तकनीकी पहलुओं को जांच का हिस्सा कैसे बनाया जाए और अदालत में मामले को मजबूती से पेश करने के लिए जांच की गुणवत्ता कैसे बेहतर की जाए।
12 से 16 अक्टूबर तक फिर होगी विशेष ट्रेनिंग
झारखंड पुलिस के अधिकारियों को बेहतर और प्रभावी अनुसंधान के लिए एक और विशेष प्रशिक्षण अभियान 12 से 16 अक्टूबर तक आयोजित किया जाएगा। इसका आयोजन रांची के होटवार स्थित अनुसंधान प्रशिक्षण विद्यालय में किया जाएगा। प्रशिक्षण ऑफलाइन के साथ-साथ ऑनलाइन माध्यम से भी होगा, जिससे ज्यादा से ज्यादा अधिकारी इसका लाभ उठा सकें।
पुलिस अधिकारियों की यह ट्रेनिंग कोई एक बार की प्रक्रिया नहीं है। अधिकारियों को आधुनिक कानून और वैज्ञानिक अनुसंधान के अलग-अलग पहलुओं से लगातार परिचित कराने के लिए हर महीने संबंधित कोर्स आयोजित किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य पुलिस जांच को पारंपरिक तरीके से आगे बढ़ाने के बजाय आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर मजबूत करना है।
NIA विशेषज्ञों ने भी समझाई कानूनी बारीकियां
कुछ दिन पहले राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी NIA के विशेषज्ञ अधिकारियों ने झारखंड पुलिस के अनुसंधान पदाधिकारियों को ऑनलाइन प्रशिक्षण दिया था। इस दौरान गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA से जुड़े प्रावधानों और उसके तहत होने वाली जांच की बारीकियों को समझाया गया।
आतंकी गतिविधियों और माओवादी गतिविधियों से जुड़े मामलों में UAPA जैसे कड़े कानूनों का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे मामलों में जांच के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसलिए पुलिस अधिकारियों को यह समझाया गया कि इस कानून के तहत किसी मामले की जांच करते समय किस तरह के साक्ष्य जुटाने की जरूरत होती है और वैज्ञानिक तरीके से जांच को कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है।
नए आपराधिक कानूनों की भी दी गई ट्रेनिंग
झारखंड पुलिस के अधिकारियों को भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों और उनके व्यावहारिक इस्तेमाल की भी ट्रेनिंग दी जा चुकी है। अधिकारियों को इन कानूनों की बारीकियों के साथ-साथ अनुसंधान के दौरान इनके प्रभावी इस्तेमाल की जानकारी दी गई है।
पुलिस के लिए इस तरह का प्रशिक्षण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नए आपराधिक कानूनों के लागू होने के बाद जांच और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े कई प्रावधानों में बदलाव आया है। ऐसे में अनुसंधान अधिकारियों को कानून की नई व्यवस्था के अनुरूप जांच करने और साक्ष्य जुटाने के तरीके समझाना जरूरी है।
जांच की गुणवत्ता बढ़ाना है मुख्य उद्देश्य
झारखंड पुलिस की इस पूरी प्रशिक्षण प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य अनुसंधान की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है। खासकर आतंकवाद, माओवादी गतिविधियों और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में पुलिस चाहती है कि जांच वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्यों पर आधारित हो, ताकि अदालत में भी केस मजबूती से टिक सके।
बदलते दौर में अपराधी तकनीक का इस्तेमाल कर पुलिस से बचने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में पुलिस के सामने चुनौती केवल अपराध रोकने की नहीं, बल्कि अपराध के पीछे इस्तेमाल की गई तकनीक को समझकर उसके डिजिटल और वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने की भी है। इसी चुनौती से निपटने के लिए झारखंड पुलिस अपने अधिकारियों को लगातार हाईटेक ट्रेनिंग दे रही है। अब 12 अक्टूबर से शुरू होने वाला नया प्रशिक्षण अभियान इसी कवायद को आगे बढ़ाएगा।









