शिक्षक को कोर्ट ने किया बरी: FIR में देरी और मेडिकल रिपोर्ट पर सवाल, शिक्षक को कोर्ट ने किया बरी, जानिये क्या है पूरा मामला

The court acquitted the teacher: the delay in filing the FIR and questions the medical report, the court acquitted the teacher, find out what the whole matter is.

हाईकोर्ट ने दुष्कर्म मामले में ट्रायल कोर्ट की सात वर्ष की सजा को रद्द करते हुए शिक्षक को संदेह का लाभ देकर बरी किया। न्यायालय ने प्राथमिकी में देरी, बयान में विरोधाभास, मेडिकल रिपोर्ट और जांच की कमियों को फैसले का आधार माना।

Court News। दुष्कर्म के एक चर्चित आपराधिक मामले में हाईकोर्ट ने शिक्षक को बरी कर दिया। कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सात वर्ष की सश्रम कारावास की सजा को रद्द कर दिया। न्यायालय ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। यह आदेश न्यायाधीश शैलेंद्र सिंह की एकलपीठ ने पारित किया, जिसमें सजायाफ्ता श्याम जी मिश्रा की आपराधिक अपील को स्वीकार किया गया।

मामले की पृष्ठभूमि वर्ष 2012 से जुड़ी है। अभियोजन के अनुसार, 22 जनवरी 2012 को कक्षा छह में अध्ययनरत एक नाबालिग छात्रा घर से लापता हो गई थी। छात्रा के पिता ने प्राथमिकी दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि संबंधित विद्यालय में पदस्थ शिक्षक ने बहला-फुसलाकर छात्रा को अपने साथ ले जाकर विभिन्न स्थानों पर रखा और उसके साथ दुष्कर्म किया। छात्रा की बरामदगी के बाद उसका चिकित्सीय परीक्षण कराया गया।

इस संबंध में डुमरांव थाना कांड संख्या 27/2012 दर्ज हुआ, जिसमें पुलिस ने भादवि की धारा 366(ए) एवं 376 के तहत प्राथमिकी दर्ज की। अनुसंधान पूर्ण होने के पश्चात आरोप-पत्र न्यायालय में समर्पित किया गया।

ट्रायल कोर्ट का निर्णय
मामले की सुनवाई के उपरांत बक्सर के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश-द्वितीय ने 9 दिसंबर 2013 को दोषसिद्धि का आदेश पारित किया। 11 दिसंबर 2013 को सजा के बिंदु पर निर्णय देते हुए अदालत ने पीड़िता के बयान और मेडिकल बोर्ड की राय पर भरोसा करते हुए आरोपी को भादवि की धारा 376 के तहत दोषी करार दिया तथा सात वर्ष की सश्रम कारावास की सजा सुनाई।

सजायाफ्ता श्याम जी मिश्रा उर्फ मनीन्द्र मिश्रा ने उक्त निर्णय को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में आपराधिक अपील दायर की। अपील की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों, बयान और जांच प्रक्रिया की गहन समीक्षा की। इस प्रकरण में कोर्ट मित्र के रूप में अधिवक्ता सुमित कुमार सिंह ने सहायता प्रदान की।

हाई कोर्ट का विश्लेषण और आधार
हाई कोर्ट ने अपने विस्तृत निर्णय में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विचार किया। न्यायालय ने प्राथमिकी दर्ज करने में नौ दिन की देरी को उल्लेखनीय माना और कहा कि इस विलंब का समुचित एवं संतोषजनक स्पष्टीकरण रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है। अदालत के अनुसार, आपराधिक मामलों में देरी का प्रश्न साक्ष्य की विश्वसनीयता पर प्रभाव डाल सकता है।

इसके अतिरिक्त, पीड़िता के धारा 164 दंप्रसं के अंतर्गत दर्ज बयान और न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्य में पाए गए विरोधाभासों को न्यायालय ने गंभीरता से लिया। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि मेडिकल रिपोर्ट में जबरन दुष्कर्म के स्पष्ट संकेत नहीं मिले।

न्यायालय ने जांच अधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि कथित होटलों एवं यात्रा स्थलों की पुष्टि नहीं किया जाना जांच की एक महत्वपूर्ण कमी है। इन तथ्यों को समग्र रूप से देखते हुए अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा।

फैसले का महत्व
हाई कोर्ट के इस निर्णय को आपराधिक न्याय व्यवस्था के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां न्यायालय ने साक्ष्य की गुणवत्ता, जांच की निष्पक्षता और प्रक्रिया की शुचिता को प्राथमिकता दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि के लिए आरोपों का संदेह से परे प्रमाणित होना अनिवार्य है।

Related Articles