नेपाल में तबाही का आंकड़ा 1259 पार, 5 हजार अब भी लापता! अब भारत से आएगा DNA का सहारा, ऐसे होगी अपनों की पहचान
26 अगस्त की विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने नेपाल में मचाई भारी तबाही; 12 हजार से ज्यादा लोगों को बचाया गया, लेकिन हजारों अब भी लापता। अज्ञात शवों की पहचान के लिए भारत में लापता भारतीयों के परिजनों के DNA सैंपल लिए जाएंगे।

नई दिल्ली: नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन के बाद हालात अभी भी बेहद गंभीर बने हुए हैं। हिमालयी क्षेत्र में आई इस प्राकृतिक आपदा ने हजारों परिवारों को उजाड़ दिया है। मृतकों का आंकड़ा बढ़कर कम से कम 1,259 पहुंच गया है, जबकि करीब 5,000 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।
राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है और अब तक 12 हजार से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। इस बीच लापता भारतीय नागरिकों की पहचान को लेकर भारत सरकार ने अहम कदम उठाया है। नेपाल में बरामद हो रहे अज्ञात शवों और मानव अवशेषों की पहचान के लिए भारत में मौजूद लापता भारतीयों के प्रथम श्रेणी के जैविक रिश्तेदारों के DNA सैंपल लेकर प्रोफाइल तैयार की जाएगी।
1259 मौतें, 5 हजार लोग अब भी लापता
नेपाल में बाढ़ और उससे जुड़ी आपदा ने भारी तबाही मचाई है। मृतकों की संख्या 1,259 तक पहुंच चुकी है, जबकि करीब 5,000 लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है।
हजारों लोग विस्थापित हुए हैं और बड़ी संख्या में मकान पूरी तरह या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। नेपाल की आपदा प्रबंधन एजेंसी के मुताबिक करीब 20 हजार घरों के पुनर्निर्माण की जरूरत हो सकती है, जिनमें लगभग 7,500 मकान पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं।
आपदा से होने वाले आर्थिक नुकसान का शुरुआती अनुमान करीब 387.5 अरब नेपाली रुपये यानी लगभग 2.56 अरब डॉलर लगाया गया है। इसमें मकान, सड़क, बिजली और अन्य बुनियादी ढांचे को हुआ नुकसान शामिल है।
आखिर कैसे आई इतनी भयावह बाढ़?
26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास हिमालयी क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के खिसकने के बाद हालात अचानक बिगड़ गए। शुरुआती आकलनों के मुताबिक, लेंगदे खोला क्षेत्र में हुए आइस-रॉक एवलॉन्च ने नदी के बहाव को प्रभावित किया।
इसके बाद पानी, बर्फ, चट्टान और मलबे की बेहद तेज लहर नीचे की ओर बढ़ी। इसका गंभीर असर भोटेकोशी नदी और उसके बाद त्रिशूली नदी के आसपास के इलाकों में देखने को मिला।
अचानक आई इस बाढ़ ने रास्ते में आने वाली बस्तियों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया। कई जगहों पर पूरा इलाका मलबे में तब्दील हो गया और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने का पर्याप्त समय तक नहीं मिल सका।
अब सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ बचाव नहीं, शवों की पहचान भी
आपदा के बाद नेपाल के सामने एक और बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है—बरामद हो रहे अज्ञात शवों और मानव अवशेषों की पहचान।
कई शव लंबे समय तक पानी और मलबे में दबे रहने के कारण खराब स्थिति में मिले हैं। कुछ जगहों पर सिर्फ मानव अवशेष मिलने से पहचान करना और मुश्किल हो गया है।
ऐसे में प्रशासन शवों की तस्वीरें, फिंगरप्रिंट, पहचान संबंधी जानकारी और DNA सैंपल सुरक्षित कर रहा है। वैज्ञानिक जांच के जरिए इन अवशेषों की पहचान करने की कोशिश की जा रही है।
भारत में होगी लापता भारतीयों के परिजनों की DNA प्रोफाइलिंग
लापता भारतीय नागरिकों की पहचान में मदद के लिए भारत सरकार ने अहम व्यवस्था की है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत में मौजूद लापता लोगों के प्रथम श्रेणी के जैविक रिश्तेदारों के DNA नमूने लेकर उनकी प्रोफाइल तैयार की जाएगी।
इसमें माता-पिता, बेटे-बेटी और भाई-बहन जैसे जैविक रिश्तेदार शामिल हो सकते हैं।
इसके लिए केंद्रीय और राज्य स्तर की फोरेंसिक प्रयोगशालाओं के साथ राष्ट्रीय फोरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय और DNA प्रोफाइलिंग की सुविधा वाली NABL-मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं की मदद ली जा सकती है।
इन DNA प्रोफाइलों की तुलना नेपाल में मिले अज्ञात शवों और मानव अवशेषों के DNA से की जाएगी। अगर दोनों में वैज्ञानिक रूप से मेल मिलता है तो मृतक की पहचान स्थापित करने में मदद मिल सकती है।
DNA जांच क्यों बनी सबसे जरूरी?
बाढ़ की तेज धार में कई शव काफी दूर तक बह गए हैं। लंबे समय तक पानी और मलबे में रहने के कारण कई शवों की पहचान सिर्फ चेहरे या सामान्य शारीरिक विशेषताओं से करना मुश्किल हो सकता है।
ऐसे मामलों में DNA मिलान मृतकों की पहचान का एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तरीका बन जाता है। नेपाल में बरामद शवों के नमूने सुरक्षित किए जा रहे हैं, जबकि भारत में लापता भारतीयों के परिजनों के DNA नमूने संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
इस प्रक्रिया से उन परिवारों को अपने लापता परिजनों के बारे में निश्चित जानकारी मिलने की उम्मीद है, जो कई दिनों से अपनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं।
भारत ने भेजी 21.5 टन राहत सामग्री
भारत ने नेपाल में राहत और बचाव अभियान के लिए अपनी सहायता जारी रखी है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, भारतीय वायुसेना के दो C-130J विमान 21.5 टन राहत सामग्री लेकर काठमांडो पहुंचे।
इस राहत सामग्री में जरूरी सामान के साथ मेडिकल सप्लाई और फोरेंसिक किट भी शामिल हैं। यानी भारत की मदद सिर्फ राहत सामग्री पहुंचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि मृतकों की पहचान से जुड़ी फोरेंसिक प्रक्रिया में भी सहयोग किया जा रहा है।
हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स में भी जारी है तलाश
बाढ़ ने नेपाल की कई जलविद्युत परियोजनाओं को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। कुछ परियोजनाओं के सुरंगों और भूमिगत हिस्सों में लोगों के फंसे होने की आशंका है।
करीब 900 लोगों के छह प्रभावित हाइड्रोपावर साइटों से लापता होने की जानकारी सामने आई है। कई सुरंगों के प्रवेश द्वार भारी मलबे और चट्टानों से बंद हो गए हैं।
बचाव दल सुरंगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। इंजीनियरों की टीमें सुरंगों के नक्शे और संरचना से जुड़ी जानकारी उपलब्ध करा रही हैं, ताकि अंदर फंसे लोगों तक पहुंचने का रास्ता खोजा जा सके।
नेपाल के पीएम ने उठाया जलवायु संकट का मुद्दा
नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने इस आपदा को सिर्फ स्थानीय प्राकृतिक घटना मानने के बजाय हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जलवायु संकट से जोड़ते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है।
उनका कहना है कि नेपाल जैसे देशों को जलवायु परिवर्तन का गंभीर असर झेलना पड़ रहा है, जबकि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उनका योगदान बेहद कम है।
विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों और ऊंचाई वाले इलाकों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इससे अचानक बाढ़, हिमस्खलन और मलबे से जुड़ी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।
तबाही का आर्थिक बोझ भी अरबों में
इस आपदा ने नेपाल की अर्थव्यवस्था को भी बड़ा झटका दिया है। नेपाल की राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के प्रमुख धर्मराज उप्रेती के मुताबिक, मकान, संपत्ति और बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान का अनुमान करीब 387.5 अरब नेपाली रुपये लगाया गया है।
शुरुआती चार महीनों के राहत और रिकवरी चरण में ही सड़क निर्माण, अस्थायी आश्रय, पेयजल और बिजली व्यवस्था बहाल करने के लिए करीब 52.6 मिलियन डॉलर की जरूरत पड़ सकती है।
आने वाले समय में पुनर्निर्माण की लागत इससे भी काफी ज्यादा होने की संभावना है।
नेपाल में राहत अभियान जारी है, लेकिन हजारों परिवारों की नजर अब एक ऐसी खबर पर टिकी है जो उन्हें उनके अपनों का पता दे सके। 1,259 मौतों और करीब 5,000 लोगों के लापता होने के बीच DNA प्रोफाइलिंग की यह प्रक्रिया कई परिवारों के लिए आखिरी उम्मीद बन सकती है।









