जब जेल में मनी छठियारी: जेल की दीवारों के बीच गूंजा सोहर, मां की आंखों में छलके आंसू; नवजात की छठियारी ने बदल दिया माहौल

When 'Chhathiari' was celebrated in jail: 'Sohar' songs echoed within the prison walls, and tears welled up in the mother's eyes; the newborn's 'Chhathiari' transformed the atmosphere.

रांची। यूं तो जेल का नाम सुनते ही आमतौर पर आंखों के सामने ऊंची दीवारें, बंद दरवाजे और सख्त पहरे की तस्वीर उभरती है। लेकिन हजारीबाग के लोक नायक जयप्रकाश नारायण केंद्रीय कारा में कुछ घंटों के लिए यह तस्वीर बदल गई। वहां न किसी अपराध की चर्चा थी, न सजा की… महिला वार्ड में गूंज रहे थे सोहर और मंगल गीत।

वजह थी एक नवजात का जन्म।
दरअसल एक महिला बंदी के बच्चे के जन्म के छठे दिन कारा प्रशासन और साथी महिला बंदियों ने मिलकर छठियारी पूजन कराया। फूलों और रंग-बिरंगे गुब्बारों से सजे वार्ड में जब पारंपरिक गीत गूंजे तो माहौल कुछ ऐसा हो गया, जैसे किसी घर में बच्चे के जन्म की खुशी मनाई जा रही हो।

जेल में थी मां, लेकिन खुशियां घर जैसी थीं
यह बच्चा उस दुनिया में आया, जहां उसकी मां अपनी जिंदगी के एक कठिन दौर से गुजर रही है। महिला बंदी को अपने किए अपराध की सजा भुगतनी पड़ रही है, लेकिन उसकी मां होने की पहचान और बच्चे के जन्म की खुशी किसी सजा से कम नहीं हो सकती।शायद इसी भावना को समझते हुए कारा प्रशासन ने छठे दिन की इस रस्म को सिर्फ एक औपचारिकता नहीं रहने दिया। साथी महिला बंदियों ने भी आयोजन में हिस्सा लिया और नवजात को आशीर्वाद दिया।
सोहर के बीच मां की आंखों में खुशी और भावुकता एक साथ दिखाई दी। उन आंखों में शायद बाहर की दुनिया से दूर होने का दर्द भी था और अपनी गोद में आए नन्हे जीवन को लेकर खुशी भी।

फूलों और गुब्बारों से सजा महिला वार्ड
छठियारी के लिए महिला वार्ड को फूलों और रंग-बिरंगे गुब्बारों से सजाया गया। कुछ समय के लिए जेल का वह हिस्सा किसी घर के आंगन जैसा नजर आया।साथी महिला बंदियों ने पारंपरिक सोहर और मंगल गीत गाए। नवजात को गोद में लेकर आशीर्वाद दिया गया। मां के लिए भी यह पल इसलिए खास था, क्योंकि जेल की चारदीवारी के भीतर रहते हुए भी उसे अपने बच्चे के जन्म की पारिवारिक खुशी से पूरी तरह वंचित नहीं होना पड़ा।

खीर-पूड़ी बनी, मां-बच्चे के लिए खास भोजन
छठियारी के अवसर पर खीर और पूड़ी सहित पारंपरिक भोजन तैयार किया गया। जेल अधीक्षक, कारापाल और अन्य अधिकारियों ने भी आयोजन में भाग लिया।मां और बच्चे के स्वास्थ्य की जांच कराई गई। नवजात को नए कपड़े और खिलौने दिए गए। मां और बच्चे के लिए विशेष भोजन की व्यवस्था की गई।

खास बात यह रही कि कारा अधीक्षक और जेलर ने स्वयं मां को भोजन परोसा।यह दृश्य जेल के सामान्य अनुशासन से अलग था, लेकिन शायद यही उस दिन की सबसे बड़ी बात थी—एक बंदी को सिर्फ एक कैदी के रूप में नहीं, बल्कि एक मां के रूप में देखा गया।

सजा अपनी जगह, मां की ममता अपनी जगह
किसी अपराध के लिए मिली सजा कानून का हिस्सा है। लेकिन उस सजा के बीच जन्म लेने वाले बच्चे का उस अपराध से कोई लेना-देना नहीं होता। वह तो दुनिया में आते ही सिर्फ मां की गोद और अपनापन जानता है।हजारीबाग जेल का यह आयोजन इसी मानवीय पक्ष को सामने लाता है।

जेल की दीवारें महिला बंदी की आजादी को सीमित कर सकती हैं, लेकिन उसके मातृत्व को नहीं। बच्चे के जन्म की खुशी को कुछ घंटों के लिए ही सही, उन दीवारों के भीतर जगह मिली।साथी महिला बंदियों का इस खुशी में शामिल होना भी अपने आप में भावुक करने वाला था। जिन महिलाओं की अपनी जिंदगी अलग-अलग वजहों से जेल तक पहुंची है, वे उस दिन एक नवजात के लिए एक साथ खड़ी थीं—बिना किसी पहचान, अपराध या अतीत की दीवार के।

जेल आईजी ने बताया बच्चों के लिए होती हैं विशेष व्यवस्थाएं
जेल आईजी सुदर्शन मंडल ने बताया कि महिला बंदियों के साथ रहने वाले बच्चों के लिए जेलों में विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं। कई जिलों में बच्चों के लिए ‘गोल्डन केज’ का निर्माण भी कराया गया है। जन्म जैसे अवसरों पर जेल प्रशासन की ओर से पारंपरिक आयोजन किए जाते हैं, ताकि बच्चों को जेल के वातावरण के बीच भी जरूरी देखभाल और अपनापन मिल सके।

सख्त दीवारों के बीच इंसानियत की एक नरम तस्वीर
उस दिन हजारीबाग जेल में शायद सबसे ज्यादा याद रहने वाली चीज कोई सजावट या पकवान नहीं था। वह था एक मां के चेहरे पर आया सुकून और एक नवजात के लिए गूंजता आशीर्वाद।जेल की दीवारें ऊंची थीं, पहरा सख्त था और जिंदगी अपनी सीमाओं में बंधी थी। लेकिन सोहर की आवाज ने कुछ देर के लिए उन दीवारों के पार की दुनिया का एहसास करा दिया।

क्योंकि सजा किसी के अपराध की हो सकती है, लेकिन बच्चे का जन्म सजा नहीं होता।
और मां की गोद में जब एक नया जीवन आता है, तो उस पल में इंसानियत की जगह किसी जेल की दीवार से बड़ी हो जाती है।

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