साड़ी में नंगे पैर नौकरी की ट्रायल दौड़ पूरी करने वाली कविता महतो को जानिए…
झारखंड के रामगढ़ की 31 वर्षीय कविता महतो ने बिना जूते और ट्रैक सूट के ट्रायल दौड़ पूरी कर सबको चौंकाया; पति और देवर को बीमारी से खोने के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर, सास और देवरानी ने बढ़ाया हौसला।

रामगढ़। झारखंड के रामगढ़ जिले से सामने आई कविता महतो की कहानी संघर्ष, हिम्मत और उम्मीद की मिसाल बन गई है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में एक महिला साड़ी पहनकर और नंगे पैर दौड़ती दिखाई देती है। यह महिला कोई पेशेवर धाविका नहीं, बल्कि सोसो गांव की रहने वाली 31 वर्षीय कविता महतो हैं, जिन्होंने होमगार्ड भर्ती की तैयारी के दौरान 1600 मीटर की ट्रायल दौड़ लगभग नौ मिनट में पूरी कर ली। न आधुनिक जूते, न ट्रैक सूट और न ही पेशेवर प्रशिक्षण की सुविधा, इसके बावजूद कविता ने अपनी मेहनत और हौसले से लोगों का ध्यान खींचा है।
कविता के लिए यह दौड़ सिर्फ एक शारीरिक परीक्षा नहीं, बल्कि अपने परिवार को आर्थिक मुश्किलों से बाहर निकालने की उम्मीद भी है। पति की मौत के बाद बच्चों और बुजुर्ग सास-ससुर की जिम्मेदारी संभाल रहीं कविता अब होमगार्ड की नौकरी हासिल कर अपने परिवार का भविष्य बेहतर बनाना चाहती हैं।
पहली बार दौड़ीं और साड़ी में ही पूरी कर दी 1600 मीटर की चुनौती
रामगढ़ के सिद्धो-कान्हू मैदान में चार अक्टूबर को होमगार्ड भर्ती की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए 1600 मीटर की ट्रायल दौड़ आयोजित की गई थी। इसी दौरान कविता महतो भी मैदान पहुंचीं। यह उनके जीवन का पहला मौका था, जब उन्होंने इस तरह की दौड़ में हिस्सा लिया। वह अपने गांव सोसो से करीब 16 किलोमीटर की दूरी तय कर मैदान पहुंची थीं।
कविता ने साड़ी पहनकर और नंगे पैर दौड़ना शुरू किया। शुरुआत में उन्हें खुद भी भरोसा नहीं था कि वह तय समय में दूरी पूरी कर पाएंगी। लेकिन जैसे-जैसे वह आगे बढ़ीं, उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया। उन्होंने लगभग नौ मिनट में 1600 मीटर की दौड़ पूरी कर ली। महिला अभ्यर्थियों के लिए निर्धारित समय 10 मिनट बताया गया है।
ट्रायल आयोजित कराने वाले ट्रेनर अंकित अग्रवाल ने कविता के प्रदर्शन की सराहना करते हुए कहा कि संसाधनों की कमी सपनों के रास्ते में बाधा नहीं बननी चाहिए। कविता की दौड़ का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद उन्हें मुफ्त प्रशिक्षण देने की पेशकश भी मिली।
पति और देवर को खोने के बाद परिवार की जिम्मेदारी कविता पर
कविता की जिंदगी का संघर्ष मैदान में दौड़ने से कहीं पहले शुरू हो चुका था। उनके पति गुजरात की एक फैक्ट्री में सुपरवाइजर थे। परिवार के मुताबिक, उन्हें लिवर से जुड़ी परेशानी हुई थी और लंबे समय तक बीमारी से जूझने के बाद वर्ष 2023 में उनका निधन हो गया।
पति की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ गईं। कविता के देवर परिवार को संभालने में मदद कर रहे थे, लेकिन वर्ष 2025 में लंबी बीमारी के बाद उनका भी निधन हो गया। इसके बाद परिवार पर आर्थिक और घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ और बढ़ गया।
कविता 12वीं तक पढ़ी हैं। उनके दो बच्चे हैं, जिनमें बेटी की उम्र 13 वर्ष और बेटे की उम्र 11 वर्ष बताई गई है। वह अपने बच्चों के साथ सोसो गांव में बुजुर्ग सास-ससुर के साथ रहती हैं। सीमित संसाधनों के बीच बच्चों की परवरिश और परिवार का खर्च चलाना उनके लिए रोज की चुनौती है।
सास और देवरानी ने दिखाई नौकरी की राह
कविता को होमगार्ड भर्ती के बारे में उनकी देवरानी सरिता से जानकारी मिली। सरिता रामगढ़ में अपने मायके में रहकर मजदूरी करती हैं। उन्होंने खुद भर्ती की जानकारी हासिल करने के बाद कविता को भी आवेदन करने के लिए प्रेरित किया। परिवार के प्रोत्साहन पर कविता ने ऑनलाइन आवेदन किया और शारीरिक परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी।
कविता बताती हैं कि गांव के लोगों ने उनके आवासीय और जाति प्रमाणपत्र बनवाने में मदद की। इससे उनका हौसला बढ़ा। इसके बाद उन्होंने सुबह करीब चार बजे गांव के बाहर दौड़ने का अभ्यास शुरू किया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी।
कविता की सास फुलको देवी भी चाहती हैं कि उनकी बहू को नौकरी मिले, ताकि परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर सके। उनका कहना है कि दोनों बहुएं विधवा हैं और यदि उन्हें रोजगार मिल जाए, तो बच्चों की बेहतर परवरिश के साथ बुजुर्गों का जीवन भी कुछ आसान हो सकेगा।
दूध बेचकर और मजदूरी करके चलाती हैं घर
कविता के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कठिन बताई गई है। परिवार के पास दो कमरों का मकान है। परिवार के अनुसार, पहले कमाई से जमा की गई रकम दोनों भाइयों के लंबे इलाज में खर्च हो गई और अब परिवार पर कर्ज का बोझ भी है।
घर चलाने के लिए कविता गाय का दूध बेचती हैं और गांव में धान, मक्का तथा मूंगफली के खेतों में मजदूरी करती हैं। गर्मियों में ईंट-भट्ठे पर काम मिलने पर वहां भी मजदूरी करती हैं। परिवार की आमदनी सीमित होने के कारण रोजमर्रा के खर्च और बच्चों की जरूरतों को पूरा करना आसान नहीं है।
कविता की सास फुलको देवी के मुताबिक, परिवार के पास इतनी जमीन नहीं है कि उससे सभी का गुजारा हो सके। ऐसे में कविता ही परिवार के लिए सबसे बड़ा सहारा हैं। यही वजह है कि होमगार्ड की नौकरी उनके लिए केवल रोजगार नहीं, बल्कि परिवार को स्थिरता देने का एक बड़ा अवसर है।
रोज 16 किलोमीटर का सफर, फिर मैदान में अभ्यास
होमगार्ड भर्ती की तैयारी के लिए कविता को हर दिन लंबा सफर तय करना पड़ता है। वह सुबह जल्दी उठकर रामगढ़ के मैदान पहुंचती हैं, जहां अन्य महिला अभ्यर्थियों के साथ अभ्यास करती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वह करीब 16 किलोमीटर का सफर तय करके मैदान पहुंचती हैं और सुबह से लगभग 10 बजे तक अभ्यास करने के बाद गांव लौटती हैं।
कविता बताती हैं कि ट्रायल दौड़ वाले दिन भी वह बिना कुछ खाए मैदान पहुंची थीं। उन्हें अंदाजा नहीं था कि वह 1600 मीटर की दूरी पूरी कर पाएंगी, लेकिन दौड़ पूरी होने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ा। वीडियो वायरल होने के बाद ट्रेनर अंकित अग्रवाल ने उन्हें मुफ्त प्रशिक्षण देना शुरू किया और दौड़ने के लिए ट्रैक सूट तथा जूते भी उपलब्ध कराए।
वायरल वीडियो से मिली पहचान, लेकिन असफलता का डर भी
कविता की दौड़ का वीडियो वायरल होने के बाद उन्हें लोगों की सराहना मिल रही है। हालांकि, इस अचानक मिली पहचान से वह थोड़ी असहज भी हैं। उन्हें चिंता है कि यदि वह मुख्य भर्ती प्रक्रिया में सफल नहीं हो पाईं, तो गांव के लोग उनका मजाक उड़ा सकते हैं।
कविता के मन में एक ओर परिवार को बेहतर जीवन देने की उम्मीद है, तो दूसरी ओर लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का दबाव भी है। इसके बावजूद वह अभ्यास जारी रखे हुए हैं। उनके लिए सबसे अहम लक्ष्य होमगार्ड की नौकरी हासिल करना और अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बनाना है।
कविता महतो की कहानी बताती है कि कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना कितना महत्वपूर्ण है। साड़ी में नंगे पैर दौड़कर उन्होंने अपनी क्षमता की झलक जरूर दिखाई है, लेकिन उनकी असली मंजिल भर्ती प्रक्रिया में सफल होकर परिवार को आर्थिक सहारा देना है। अब उनकी मेहनत और तैयारी का अगला पड़ाव तय करेगा कि यह संघर्ष उन्हें किस मुकाम तक पहुंचाता है।









