झारखंड ACB की 216 जांचों पर हाईकोर्ट का सख्त रुख, 10 साल से अटकी फाइलों पर अब कार्रवाई की डेडलाइन; 6 महीने बाद कोर्ट में देना होगा हिसाब

भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में 216 प्रारंभिक जांच लंबित होने पर झारखंड हाईकोर्ट ने समयबद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए। जांच सामान्यतः 3 महीने में पूरी करनी होगी, जबकि जांच पूरी होने के बाद प्राथमिकी की अनुमति या आगे की कार्रवाई पर 3 महीने में फैसला लेना होगा।

रांची। झारखंड में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच वर्षों तक लंबित रहने के मामले पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) में 216 प्रारंभिक जांच लंबित होने की जानकारी सामने आने के बाद अदालत ने जांच पूरी करने और फाइलों पर निर्णय लेने के लिए स्पष्ट समयसीमा तय की है। कोर्ट ने कहा कि प्रारंभिक जांच को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता। सामान्य परिस्थितियों में जांच तीन महीने के भीतर पूरी होनी चाहिए और देरी होने पर उसके कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएस सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान ये निर्देश दिए। अदालत ने राज्य सरकार और ACB को आदेश का पालन सुनिश्चित करने को कहा है। साथ ही, ACB के महानिदेशक को छह महीने बाद प्रत्येक लंबित जांच की स्थिति बताते हुए विस्तृत रिपोर्ट हाईकोर्ट में दाखिल करनी होगी।

216 मामलों में से 43 की जांच पूरी, फिर भी फाइलें लंबित

राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल रिपोर्ट के अनुसार, ACB में कुल 216 प्रारंभिक जांच लंबित हैं। इनमें से 43 मामलों की जांच पूरी हो चुकी है, लेकिन प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति या आगे की कार्रवाई से संबंधित फाइलें कैबिनेट और अन्य सक्षम प्राधिकारियों के स्तर पर लंबित हैं। इन 43 फाइलों में 23 दिसंबर 2025 से पहले से लंबित बताई गई हैं।

वहीं, शेष 173 मामलों में प्रारंभिक जांच अभी ACB के स्तर पर जारी है। रिकॉर्ड देखने के बाद अदालत ने कहा कि कई जांच एक दशक से भी अधिक समय से लंबित हैं। कोर्ट ने इसे गंभीर चिंता का विषय बताया, क्योंकि राज्य सरकार के दिशा-निर्देशों में प्रारंभिक जांच तीन महीने में पूरी करने का प्रावधान है।

तीन महीने में जांच, छह महीने से ज्यादा देरी पर लिखित कारण जरूरी

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रारंभिक जांच सामान्यतः तीन महीने के भीतर पूरी की जाए। यदि किसी मामले में जांच की अवधि बढ़ाने की जरूरत पड़ती है, तो ACB प्रमुख समय विस्तार दे सकेंगे। हालांकि, जांच को छह महीने के भीतर पूरा करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

यदि किसी मामले में छह महीने से अधिक समय लगता है, तो ACB प्रमुख को देरी के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे। इसके साथ ही जांच पूरी करने के लिए आगे कितनी अवधि की जरूरत है, यह भी स्पष्ट करना होगा। अदालत ने जांच की नियमित समीक्षा करने और समय बढ़ाने के कारणों को संबंधित फाइल में दर्ज रखने का निर्देश दिया है।

इन कारणों की समीक्षा सक्षम प्राधिकारी करेंगे। अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिए जाने की स्थिति में कानून के तहत साझा की जा सकने वाली जानकारी उसे उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

जांच पूरी होने के बाद फाइल तीन महीने तक नहीं अटकेगी

हाईकोर्ट ने उन मामलों के लिए भी समयसीमा तय की है, जिनमें प्रारंभिक जांच पूरी हो चुकी है, लेकिन प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति या आगे की कार्रवाई पर फैसला नहीं हुआ है।

अदालत के निर्देश के अनुसार, कैबिनेट, कैबिनेट निगरानी विभाग या संबंधित सक्षम प्राधिकारी को फाइल मिलने के तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। यदि अतिरिक्त समय की जरूरत होती है, तो उचित कारण लिखित रूप में दर्ज करके एक महीने का अतिरिक्त समय लिया जा सकेगा।

इस निर्देश का उद्देश्य जांच पूरी होने के बाद फाइलों को लंबे समय तक निर्णय के इंतजार में पड़े रहने से रोकना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पहले से लंबित मामलों पर भी यही समयसीमा लागू होगी।

पुरानी जांचों को भी छह महीने में पूरा करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि ACB के स्तर पर पहले से लंबित प्रारंभिक जांचों को आदेश की तारीख से छह महीने के भीतर पूरा किया जाए। यदि किसी जांच को इसके बाद भी जारी रखना जरूरी हो, तो ACB प्रमुख को उचित कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे और निर्धारित प्रक्रिया के तहत समीक्षा करनी होगी।

इसी तरह, जांच पूरी होने के बाद अनुमति या आगे के आदेश की प्रतीक्षा कर रही फाइलों पर सक्षम प्राधिकारी को तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा। उचित कारण होने पर एक महीने का अतिरिक्त समय लिया जा सकेगा।

छह महीने बाद हाईकोर्ट में पेश करनी होगी विस्तृत रिपोर्ट

अदालत ने ACB के महानिदेशक को आदेश की तारीख से छह महीने पूरे होने पर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट में प्रत्येक लंबित प्रारंभिक जांच की स्थिति स्पष्ट करनी होगी।

इसमें जांच शुरू होने की तारीख, जांच पूरी हुई है या नहीं, पूरी होने पर फाइल सक्षम प्राधिकारी को भेजी गई है या नहीं, प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति मिली है या नहीं और मामला बंद करने अथवा आगे की कार्रवाई को लेकर कोई आदेश पारित हुआ है या नहीं, जैसी जानकारियां शामिल करनी होंगी।

रिपोर्ट के माध्यम से अदालत लंबित मामलों में हुई प्रगति का आकलन कर सकेगी। कोर्ट ने मुख्य सचिव, गृह सचिव और ACB के महानिदेशक को फैसले की प्रति उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया है।

देरी से जांच के साथ प्रभावित होते हैं संबंधित लोगों के अधिकार

खंडपीठ ने कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच में अनुचित और अत्यधिक देरी आपराधिक न्याय व्यवस्था को प्रभावित करती है। इससे गंभीर आरोपों वाले मामलों में कार्रवाई में विलंब हो सकता है। दूसरी ओर, जिन व्यक्तियों के खिलाफ प्रारंभिक जांच लंबित रहती है, उन्हें भी लंबे समय तक अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है। इसका असर उनके सेवाकाल, सतर्कता मंजूरी और प्रतिष्ठा पर पड़ सकता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के आरोपों की उचित जांच कर दोषियों को कानून के अनुसार जवाबदेह बनाना जरूरी है, लेकिन किसी व्यक्ति को पर्याप्त कारण के बिना वर्षों तक प्रारंभिक जांच के दायरे में नहीं रखा जा सकता। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के साथ-साथ त्वरित और निष्पक्ष न्याय के अधिकारों का संतुलन भी जरूरी है।

खंडपीठ ने जनहित याचिका का निष्पादन करते हुए राज्य सरकार और ACB को सभी निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने को कहा। अब छह महीने बाद दाखिल होने वाली स्टेटस रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि लंबित जांचों और निर्णय की प्रतीक्षा कर रही फाइलों पर कितनी प्रगति हुई है।

Anita Nishad

Anita Nishad is a dedicated and insightful journalist currently serving as a key voice at HPBL News. With a deep-rooted passion for storytelling and truth-seeking, Anita has become a trusted name in digital and broadcast journalism, particularly known for her ability to bring grassroots issues to the forefront.

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