DPDP कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पत्रकारों की जांच पर लग सकती है रोक? केंद्र सरकार से मांगा जवाब

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन ने डेटा संरक्षण कानून के प्रावधानों को दी चुनौती, मीडिया को आशंका है कि खोजी पत्रकारिता और गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा पर पड़ सकता है असर

नई दिल्ली। प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिकों की निजता के अधिकार के बीच संतुलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम मामला पहुंचा है। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 यानी DPDP कानून के कुछ प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन की याचिका पर अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। इस मामले ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए खोजी पत्रकारिता और जनहित से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग को कैसे सुरक्षित रखा जाए।

मीडिया संस्थानों का तर्क है कि यदि कानून के प्रावधान पत्रकारिता पर बिना किसी स्पष्ट छूट के लागू होते हैं, तो भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और दूसरे सार्वजनिक महत्व के मामलों की जांच करना मुश्किल हो सकता है। उन्हें यह भी आशंका है कि खबरों के लिए जानकारी जुटाने में इस्तेमाल होने वाले गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का खतरा बढ़ सकता है।

प्रेस की आजादी और नागरिकों की निजता पर बहस

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि मीडिया संगठन इस क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं और वे सरकार को ऐसे उपाय सुझाने में मदद कर सकते हैं, जिनसे कानून के संभावित दुरुपयोग को रोका जा सके। साथ ही निर्दोष नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित हो।

अदालत की टिप्पणी का प्रमुख पहलू यह था कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता और नागरिकों की निजता के अधिकार के बीच स्पष्ट संतुलन जरूरी है। एक तरफ नागरिकों के निजी डेटा की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, तो दूसरी तरफ स्वतंत्र मीडिया को जनहित से जुड़े मामलों की जांच करने और तथ्यों को सामने लाने का अवसर मिलना चाहिए।

इस मामले में अदालत को यह देखना होगा कि डेटा संरक्षण से जुड़े प्रावधानों का इस्तेमाल किस तरह किया जाए, ताकि नागरिकों की निजता सुरक्षित रहे और पत्रकारों के लिए सार्वजनिक महत्व के मामलों की पड़ताल करना अनावश्यक रूप से कठिन न हो।

जांच से पहले अनुमति लेने की शर्त पर सवाल

याचिका में कानून के उन प्रावधानों को लेकर चिंता जताई गई है, जिनका असर पत्रकारों की ओर से व्यक्तिगत डेटा जुटाने, इस्तेमाल करने और सुरक्षित रखने की प्रक्रिया पर पड़ सकता है। मीडिया संगठनों का कहना है कि खोजी पत्रकारिता में कई बार ऐसे लोगों के कामकाज की जांच करनी पड़ती है, जिन पर अनियमितताओं या गलत गतिविधियों में शामिल होने के आरोप होते हैं।

ऐसी स्थिति में यदि रिपोर्टिंग के लिए संबंधित व्यक्ति की सहमति जरूरी हो जाती है, तो जांच प्रभावित हो सकती है। मीडिया संस्थानों की दलील है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ किसी मामले की पड़ताल की जा रही हो, उसी की अनुमति पर पत्रकारिता को निर्भर नहीं छोड़ा जा सकता।

प्रकाशकों ने व्यक्तिगत डेटा को सुरक्षित रखने और निर्धारित परिस्थितियों में उसे हटाने से जुड़ी कानूनी जिम्मेदारियों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इन नियमों का पत्रकारिता पर व्यापक असर पड़ सकता है, खासकर तब जब किसी खबर के लिए दस्तावेजों, रिकॉर्ड या दूसरे व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल करना जरूरी हो।

गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का डर

खोजी पत्रकारिता में गोपनीय सूत्रों की भूमिका अहम होती है। कई बार भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितताओं या जनहित से जुड़े मामलों की जानकारी ऐसे लोगों से मिलती है, जो अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करना चाहते। मीडिया संस्थानों को आशंका है कि डेटा संरक्षण कानून के अनुपालन से जुड़ी जिम्मेदारियां पत्रकारों के लिए ऐसे सूत्रों की गोपनीयता बनाए रखना कठिन कर सकती हैं।

याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, यदि पत्रकारों को रिपोर्टिंग के दौरान जुटाए गए व्यक्तिगत डेटा को लेकर व्यापक कानूनी जिम्मेदारियों का सामना करना पड़े, तो संवेदनशील मामलों की जांच प्रभावित हो सकती है। उनका तर्क है कि इससे खबरों के प्रकाशन पर अप्रत्यक्ष दबाव पैदा होने की आशंका है।

मीडिया की ओर से यह भी दलील दी गई कि कानून का उद्देश्य पत्रकारों को नियंत्रित करना नहीं था, लेकिन यदि इसके प्रावधानों को पत्रकारिता पर व्यापक रूप से लागू किया जाता है, तो खबर प्रकाशित होने से पहले ही रिपोर्टिंग में बाधाएं पैदा हो सकती हैं। याचिका में इसे प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार के लिए चिंता का विषय बताया गया है।

अब केंद्र सरकार के जवाब पर नजर

सुप्रीम कोर्ट की ओर से नोटिस जारी किए जाने के बाद अब केंद्र सरकार का पक्ष महत्वपूर्ण होगा। सरकार को कानून के प्रावधानों और मीडिया की ओर से उठाई गई चिंताओं पर अपना जवाब देना है। इसके बाद मामले की सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकेगा कि पत्रकारिता से जुड़ी गतिविधियों पर कानून के प्रभाव को लेकर अदालत किन पहलुओं पर विचार करती है।

फिलहाल अदालत ने याचिका पर केंद्र का जवाब मांगा है। इसे कानून के प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित किए जाने या उन पर रोक लगाए जाने का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। मामले का आगे का रुख सरकार के जवाब और अदालत में होने वाली सुनवाई पर निर्भर करेगा।

यह मामला डिजिटल दौर में निजता की सुरक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच संतुलन तय करने की व्यापक बहस से जुड़ा है। इसका असर केवल डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि जनहित में जानकारी जुटाने, खोजी रिपोर्टिंग करने और नागरिकों के अधिकारों से जुड़े मामलों को सामने लाने की प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।

Anita Nishad

Anita Nishad is a dedicated and insightful journalist currently serving as a key voice at HPBL News. With a deep-rooted passion for storytelling and truth-seeking, Anita has become a trusted name in digital and broadcast journalism, particularly known for her ability to bring grassroots issues to the forefront.

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