Supreme Court News : प्रमोशन के 2 महीने बाद जबरन रिटायरमेंट, सुप्रीम कोर्ट ने पलटा फैसला; पूर्व अधिकारी को मिलेंगे 15 लाख रुपये
Supreme Court News । जबरन रिटायरमेंट दिये जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को 15 लाख रुपये देने के साथ-साथ सम्मानजनक तरीके से रिटायरमेंट देने का आदेश दिया है। दरअसल याचिकाकर्ता को रिटायरमेंट के चार पहले सरकार ने जबरिया रिटायर कर दिया था।
सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय व्यापार सेवा (ITS) के पूर्व अधिकारी एस.एस. दास को समय से करीब पांच साल पहले अनिवार्य रूप से रिटायर करने के केंद्र सरकार के फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत ने इस कार्रवाई को मनमाना और दुर्भावनापूर्ण तरीके से शक्ति का इस्तेमाल माना और केंद्र को अधिकारी को कुल 15 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
मुआवजे में 9 लाख रुपये मानहानि और 6 लाख रुपये मुकदमे के खर्च के लिए दिए जाने हैं। अदालत ने इसके अलावा अधिकारी को उनके सभी सेवा लाभ देने का आदेश दिया है, जैसे उन्हें कभी अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त किया ही नहीं गया हो।सुप्रीम कोर्ट ने विदेश व्यापार महानिदेशक (DGFT) को यह भी निर्देश दिया कि एस.एस. दास को कार्यालय बुलाकर पूरे सम्मान के साथ विदाई दी जाए।
जिस अधिकारी को प्रमोशन दिया, दो महीने बाद उसी को बताया ‘डेडवुड’
मामले की सुनवाई जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने की। अदालत के सामने सबसे अहम सवाल यह था कि जिस अधिकारी को उनकी योग्यता और सेवा रिकॉर्ड के आधार पर हाल ही में उच्च पद पर पदोन्नत किया गया, उसे महज दो महीने बाद आखिर किस आधार पर सेवा से बाहर कर दिया गया।
एस.एस. दास वर्ष 1989 में भारतीय व्यापार सेवा में शामिल हुए थे। करीब तीन दशक के करियर में उन्हें लगातार पदोन्नतियां मिलीं और उनके सेवा रिकॉर्ड में कई मौकों पर ‘आउटस्टैंडिंग’ और ‘वेरी गुड’ जैसी ग्रेडिंग दर्ज थी।
फरवरी 2018 में उन्हें यूपीएससी की मंजूरी और संबंधित प्रक्रिया पूरी होने के बाद संयुक्त सचिव स्तर पर पदोन्नति दी गई। लेकिन इसके महज दो महीने बाद, 10 मई 2018 को उन्हें मौलिक नियम यानी FR 56(j) के तहत सामान्य सेवानिवृत्ति की निर्धारित उम्र से करीब पांच साल पहले अनिवार्य रूप से रिटायर कर दिया गया।
पुरानी टिप्पणियों के आधार पर लिया गया फैसला
सरकार की ओर से उनके खिलाफ कुछ पुराने गोपनीय रिकॉर्ड और टिप्पणियों को आधार बनाया गया था। इनमें उनके प्रदर्शन और सत्यनिष्ठा से जुड़ी पुरानी टिप्पणियां शामिल थीं। इन्हीं के आधार पर उन्हें सेवा में आगे बनाए रखने के लिहाज से उपयुक्त नहीं माना गया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण विरोधाभास पाया। अदालत ने सवाल उठाया कि अगर अधिकारी का प्रदर्शन इतना खराब था कि उन्हें सेवा में बनाए रखना जनहित में उचित नहीं था, तो फिर उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति से ठीक पहले उच्च पद पर पदोन्नत करने का फैसला कैसे सही था?पीठ ने माना कि हालिया पदोन्नति और उसके तुरंत बाद ‘डेडवुड’ मानकर सेवा से हटाने की कार्रवाई के बीच स्पष्ट विरोधाभास है।
FR 56(j) की शक्ति मनमाने इस्तेमाल के लिए नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार के पास FR 56(j) के तहत जनहित में किसी अधिकारी को समय से पहले सेवानिवृत्त करने की शक्ति जरूर है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि इस नियम को नियमित विभागीय कार्रवाई से बचने, किसी अधिकारी को हटाने के शॉर्टकट के तौर पर या बदले की भावना से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसके लिए पर्याप्त और विश्वसनीय सामग्री का होना जरूरी है।
पीठ ने यह भी कहा कि यदि किसी अधिकारी का सेवा रिकॉर्ड लगातार अच्छा रहा हो, उसे हाल में पदोन्नति दी गई हो और उसके बाद बिना किसी नए प्रतिकूल रिकॉर्ड के अचानक उसे सेवा के लिए अनुपयुक्त या ‘डेडवुड’ मान लिया जाए, तो ऐसी कार्रवाई प्रथमदृष्टया मनमानी और अधिकारों के दुरुपयोग की ओर इशारा करती है।
पहले CAT और हाईकोर्ट से नहीं मिली थी राहत
अनिवार्य सेवानिवृत्ति के खिलाफ एस.एस. दास ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) का रुख किया था। हालांकि, 2 जुलाई 2021 को CAT ने उनकी याचिका खारिज कर दी।इसके बाद उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी 18 जनवरी 2024 को उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद दास ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।सुप्रीम कोर्ट ने अब निचली अदालतों के फैसलों को पलटते हुए दास के पक्ष में फैसला सुनाया है।
ऐसे मिलेगा सेवा का पूरा लाभ
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि एस.एस. दास को सेवा से जुड़े सभी लाभ इस तरह दिए जाएं, मानो उन्हें FR 56(j) के तहत कभी अनिवार्य रूप से रिटायर किया ही नहीं गया था।यदि उनकी अनिवार्य सेवानिवृत्ति की अवधि के दौरान उनसे कनिष्ठ अधिकारियों को पदोन्नति मिली है, तो नियमों के अनुसार उन्हें उसका नोटional यानी काल्पनिक पदोन्नति लाभ भी दिया जाएगा।इसके साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार को 9 लाख रुपये मानहानि और 6 लाख रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में भुगतान करने का निर्देश दिया है।
रिटायरमेंट नहीं, सम्मान के साथ विदाई
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का सबसे अलग निर्देश अधिकारी की विदाई को लेकर रहा। अदालत ने विदेश व्यापार महानिदेशक को कहा कि एस.एस. दास को कार्यालय बुलाकर उस सम्मान के साथ विदाई दी जाए, जिसके वे अपनी सामान्य सेवानिवृत्ति के समय हकदार होते।यानी जिस अधिकारी को निर्धारित समय से पहले सेवा से बाहर कर दिया गया था, अब उन्हें उसी कार्यालय से सम्मानपूर्वक विदाई देने का आदेश दिया गया है। अदालत के इस निर्देश ने मामले के फैसले को और महत्वपूर्ण बना दिया है।









