झारखंड- 5 साथियों की मौत, 45 साल जेल की चौखट: सुप्रीम कोर्ट से 70 वर्षीय साइमन सोरेन को मिली रिहाई, न्यायिक देरी पर सख्त टिप्पणी
Supreme Court Decision: झारखंड के 1981 के दोहरे हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने 70 वर्षीय साइमन सोरेन की सजा निलंबित कर तत्काल रिहाई का आदेश दिया। कोर्ट ने 45 साल की देरी पर सवाल उठाए।

रांची/नई दिल्ली। झारखंड के दुमका में वर्ष 1981 में हुए दोहरे हत्याकांड का मामला 45 साल बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इस पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट ने करीब 70 वर्षीय दोषी साइमन सोरेन को बड़ी राहत देते हुए उनकी सजा निलंबित कर तत्काल रिहाई का आदेश दिया है।
यह फैसला सिर्फ एक दोषी की रिहाई तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के जरिए भारतीय न्याय व्यवस्था में आपराधिक मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने इस बात पर विशेष चिंता जताई कि एक आपराधिक मुकदमे को ट्रायल से लेकर अपील तक पहुंचने में लगभग 45 साल लग गए।
45 साल में मुकदमे की पूरी तस्वीर बदल गई
दुमका के इस मामले में जब घटना हुई थी, तब वर्ष 1981 था। इसके बाद वर्ष 1991 में आरोप तय हुए और ट्रायल कोर्ट ने करीब 11 साल बाद 2002 में दोषसिद्धि का फैसला सुनाया।इसके बाद मामला झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा, लेकिन वहां भी अपील के निपटारे में करीब दो दशक से अधिक समय लग गया। हाईकोर्ट ने 2024 में ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।यानी जिस समय अपराध हुआ, उस समय का आरोपी अब करीब 70 वर्ष का हो चुका है। मामले में शामिल कई आरोपी और इससे जुड़े लोग अब जीवित भी नहीं हैं।
छह आरोपी थे, अब सिर्फ साइमन सोरेन जीवित
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस तथ्य को भी गंभीरता से लिया कि मामले में शुरुआत में छह आरोपी थे। इनमें से दो की आरोप तय होने से पहले ही मृत्यु हो गई।ट्रायल कोर्ट से दोषी ठहराए गए चार आरोपियों में से भी तीन की मौत हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान हो गई। अब साइमन सोरेन इस मामले के एकमात्र जीवित दोषी बताए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उम्र और स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा। राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि साइमन सोरेन अस्पताल में भर्ती हैं और कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- 1991 के बाद भी 12 साल क्यों लगे?
मामले में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण रही। अदालत ने झारखंड हाईकोर्ट से यह रिपोर्ट मांगी थी कि आखिर ट्रायल और अपील की प्रक्रिया पूरी होने में करीब 45 साल क्यों लग गए।
हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से दाखिल हलफनामे और अन्य रिकॉर्ड देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला आपराधिक न्याय व्यवस्था में लंबित मामलों की गंभीर तस्वीर सामने लाता है।
देरी के एक कारण के रूप में यह बताया गया कि आरोपी करीब छह वर्षों तक फरार था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि 1991 में आरोप तय होने के बाद भी ट्रायल पूरा होने में करीब 12 साल क्यों लगे?अदालत को इस देरी का कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
पांच बार बदली ट्रायल कोर्ट, बढ़ता गया मुकदमे का समय
सुप्रीम कोर्ट ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1991 के बाद अगले करीब 11 वर्षों में यह मामला पांच बार एक ट्रायल कोर्ट से दूसरे ट्रायल कोर्ट में स्थानांतरित हुआ।अदालत ने माना कि इस तरह लगातार अदालत बदलने से भी मुकदमे की सुनवाई लंबी खिंचती गई।यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला सिर्फ आरोपी के फरार रहने से लंबा नहीं हुआ, बल्कि न्यायिक स्तर पर भी सुनवाई की प्रक्रिया लगातार आगे नहीं बढ़ सकी।
हाईकोर्ट की अपील में भी करीब 22 साल का इंतजार
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि आरोपी को ट्रायल पूरा होने में लगभग 22 साल लगे और उसके बाद हाईकोर्ट में आपराधिक अपील के निपटारे के लिए भी करीब 22 साल इंतजार करना पड़ा।अदालत ने इस स्थिति को न्यायिक व्यवस्था की गंभीर विफलता के रूप में देखा। खासकर ऐसे मामले में, जिसमें दोषी की उम्र अब लगभग 70 वर्ष हो चुकी है और उसके तीन सह-दोषियों की अपील लंबित रहने के दौरान ही मृत्यु हो गई।
जमानत की शर्तों पर तत्काल रिहाई
इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साइमन सोरेन की सजा को निलंबित कर दिया और उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।रिहाई के लिए उन्हें निजी जमानत प्रस्तुत करनी होगी। साथ ही जमानत की अवधि के दौरान उन्हें किसी अन्य अपराध में शामिल नहीं होना होगा।हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि को समाप्त नहीं किया है। अदालत ने फिलहाल सजा को निलंबित करते हुए रिहाई का आदेश दिया है।
18 सितंबर को फिर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट को मामले से जुड़े पूरे मूल रिकॉर्ड को भौतिक और डिजिटल दोनों रूपों में चार सप्ताह के भीतर उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर को होगी।
मामला: 45 साल का न्यायिक सफर एक नज़र में
• 1981: दुमका जिले में दोहरा हत्याकांड दर्ज हुआ।
• 1991: घटना के 10 साल बाद पहली बार आरोप (Charges) तय किए गए।
• 2002: निचली अदालत (Trial Court) ने साइमन सोरेन सहित अन्य को दोषी ठहराया।
• 2024: झारखंड हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर ट्रायल कोर्ट की सजा को बरकरार रखा।
• 2026: सुप्रीम कोर्ट ने 45 साल की असाधारण देरी, स्वास्थ्य और उम्र को देखते हुए अंतरिम रिहाई का आदेश दिया।
6 में से 5 आरोपियों की प्रक्रिया के दौरान हो चुकी है मौत
सुप्रीम कोर्ट के आदेश में यह दर्दनाक पहलू भी सामने आया कि इस मामले में कुल छह आरोपी थे।
• आरोप तय होने से पहले ही 2 आरोपियों की मौत हो गई।
• हाईकोर्ट में 22 साल तक अपील लंबित रहने के दौरान 3 और दोषियों की मृत्यु हो गई।
• वर्तमान में 70 वर्षीय साइमन सोरेन ही एकमात्र जीवित दोषी हैं, जो इस समय गंभीर बीमारियों के कारण अस्पताल में भर्ती हैं।
5 बार बदला गया ट्रायल कोर्ट, देरी का नहीं मिला वाजिब जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट की समीक्षा की। रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि 1991 के बाद 11 वर्षों के भीतर यह केस 5 अलग-अलग ट्रायल कोर्ट्स में ट्रांसफर किया गया।
पीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि हालांकि यह तर्क दिया गया कि आरोपी 6 साल फरार था, लेकिन 1991 में चार्ज फ्रेम होने के बाद भी ट्रायल में 12 साल क्यों लगे, इसका प्रशासन के पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं है।








