खनिज से करोड़ों की कमाई, लेकिन अवैध खनन रोकने की तैयारी कितनी? झारखंड के खान विभाग में न अफसर, न सर्वेयर, न अपनी गाड़ी
4,500 करोड़ रुपये राजस्व का लक्ष्य रखने वाले विभाग के फील्ड तंत्र में संसाधनों की कमी का दावा, 24 जिलों में सरकारी वाहनों का अभाव और एक भी सर्वेयर नहीं

रांची। झारखंड को खनिज संपदा के मामले में देश के प्रमुख राज्यों में गिना जाता है और राज्य के राजस्व में खान एवं भूतत्व विभाग की बड़ी भूमिका है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, खनन से राज्य के अपने गैर-कर राजस्व में करीब 85 प्रतिशत हिस्सेदारी आती है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में विभाग ने 3,885.11 करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले 4,013.53 करोड़ रुपये राजस्व जुटाया। वहीं चालू वित्तीय वर्ष के लिए राजस्व संग्रह का लक्ष्य बढ़ाकर 4,500 करोड़ रुपये किया गया है।
लेकिन सवाल यह है कि जिस विभाग पर हजारों करोड़ रुपये का राजस्व जुटाने की जिम्मेदारी है, वही विभाग अवैध खनन और खनिज परिवहन पर निगरानी कैसे रख रहा है? उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, विभाग के फील्ड तंत्र में अधिकारियों, वाहनों और तकनीकी कर्मचारियों की कमी बनी हुई है। ऐसे में अवैध खनन रोकने की व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
24 जिलों में अफसरों के पास अपनी सरकारी गाड़ी तक नहीं
जानकारी के मुताबिक राज्य के सभी 24 जिलों में जिला खनन पदाधिकारियों के पास अपना सरकारी वाहन उपलब्ध नहीं है। निरीक्षण और जांच के लिए उन्हें किराये के वाहनों पर निर्भर रहना पड़ता है। खनन जैसे ऐसे क्षेत्र में, जहां अधिकारियों को दूरदराज के इलाकों में अचानक निरीक्षण और कार्रवाई करनी पड़ती है, वाहन की कमी फील्ड निगरानी को प्रभावित करने वाली बड़ी समस्या बन सकती है।
इसके अलावा राज्य में कुल 37 माइनिंग इंस्पेक्टर उपलब्ध बताए जा रहे हैं। 24 जिलों के हिसाब से देखें तो औसतन दो से भी कम इंस्पेक्टर प्रति जिला उपलब्ध होते हैं। हालांकि जिलों में इनकी वास्तविक तैनाती समान नहीं हो सकती, लेकिन कुल संख्या से फील्ड स्तर पर मानव संसाधन की कमी का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सबसे बड़ा सवाल: एक भी सर्वेयर नहीं
खान विभाग के सामने तकनीकी स्तर पर भी बड़ी चुनौती बताई जा रही है। जानकारी के अनुसार विभाग के पास अपना एक भी सर्वेयर नहीं है। जबकि खनन पट्टे की सीमा निर्धारित करने, स्वीकृत क्षेत्र के बाहर खनन की पहचान करने और वास्तविक उत्खनन की मात्रा का आकलन करने में सर्वेयर की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
यदि किसी लीज क्षेत्र में स्वीकृत सीमा से बाहर खनन हो रहा है या निर्धारित मात्रा से अधिक खनिज निकाला जा रहा है, तो इसकी तकनीकी जांच के लिए सर्वे की आवश्यकता होती है। ऐसे में पर्याप्त सर्वे व्यवस्था नहीं होने पर लीज क्षेत्रों की नियमित और प्रभावी निगरानी चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
बिहार में अलग खान पुलिस, झारखंड में स्थानीय पुलिस पर निर्भरता
अवैध खनन और खनिज परिवहन पर कार्रवाई के लिए पड़ोसी राज्य बिहार की व्यवस्था का भी उदाहरण दिया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, बिहार में खनन विभाग के लिए अलग सुरक्षा और प्रवर्तन व्यवस्था का प्रावधान है। इसमें पुलिस, सेवानिवृत्त रक्षा कर्मियों और अर्द्धसैनिक बलों की सेवाओं का इस्तेमाल खान पुलिस के तौर पर किया जाता है।
वहीं झारखंड में जिला खनन पदाधिकारियों को कार्रवाई के लिए स्थानीय या जिला पुलिस से बल मांगना पड़ता है। ऐसे में कार्रवाई के दौरान पुलिस बल की उपलब्धता भी एक महत्वपूर्ण कारक बन जाती है। संवेदनशील इलाकों में बिना पर्याप्त सुरक्षा के छापेमारी करना अधिकारियों के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
ओडिशा में माइनिंग इंस्पेक्टर के साथ सर्वेयर की व्यवस्था
ओडिशा में खनन निगरानी के लिए अलग प्रशासनिक और तकनीकी ढांचे का उदाहरण भी सामने रखा जा रहा है। वहां माइनिंग अधिकारियों और इंस्पेक्टरों के साथ सर्वेयर की व्यवस्था होने की बात कही गई है। खनन वाले बड़े जिलों में फील्ड स्तर पर अधिकारियों और तकनीकी कर्मचारियों की टीम के जरिए लीज क्षेत्र और खनन गतिविधियों की निगरानी की जाती है।
इसके मुकाबले झारखंड में माइनिंग इंस्पेक्टरों की संख्या सीमित होने और विभागीय स्तर पर सर्वेयर नहीं होने की बात सामने आ रही है। वाहनों की कमी भी फील्ड कार्रवाई को प्रभावित करने वाली अतिरिक्त चुनौती है।
राजस्व वसूली के साथ अवैध खनन रोकने की दोहरी जिम्मेदारी
झारखंड में खान विभाग के सामने एक तरफ राजस्व संग्रह का बड़ा लक्ष्य है, तो दूसरी तरफ अवैध बालू, कोयला, बॉक्साइट, पत्थर और ग्रेनाइट खनन तथा खनिज परिवहन पर नियंत्रण की जिम्मेदारी भी है। लेकिन फील्ड में पर्याप्त अधिकारी, वाहन, तकनीकी कर्मचारी और स्वतंत्र सुरक्षा व्यवस्था नहीं होने की स्थिति में इन दोनों जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से निभाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
विभाग ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में अपने राजस्व लक्ष्य से अधिक संग्रह जरूर किया है, लेकिन अवैध खनन पर प्रभावी निगरानी के लिए केवल राजस्व आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए मजबूत फील्ड नेटवर्क, तकनीकी निगरानी, पर्याप्त मानव संसाधन और कार्रवाई के दौरान सुरक्षा व्यवस्था भी जरूरी है।
अब बड़ा सवाल यही है कि जब राज्य अपने खनिज संसाधनों से हजारों करोड़ रुपये का राजस्व जुटाने का लक्ष्य रख रहा है, तो उन संसाधनों की निगरानी करने वाले फील्ड तंत्र को कब पर्याप्त अधिकारी, वाहन, सर्वेयर और प्रभावी प्रवर्तन व्यवस्था मिलेगी। यही तय करेगा कि झारखंड में अवैध खनन और परिवहन पर कार्रवाई कितनी प्रभावी हो पाती है।









