झारखंड: अनल दा के इनकाउंटर के बाद पूरे गांव में पसरा है सन्नाटा, पतिराम मांझी से खूंखार अनल दा के बारे में बोलने से भी डर रहे ग्रामीण

Jharkhand: After Anal Da's encounter, the entire village is in a state of silence; villagers are afraid to even speak to Patiram Manjhi about the dreaded Anal Da.

Naxali Anal da Story : जवानों ने गुरुवार को बड़ी मुठभेड़ में एक करोड़ के ईनामी नक्सली अनल दा को ढेर कर दिया। सारंडा जंगल में हुई मुठभेड़ में अनल दा के साथ उनका पूरा गैंग भी साफ हो गया।

इधर अनल दा के मारे जाने की खबर के बाद उसके पैतृक गांव दीवानडीह झरहा में सन्नाटा पसरा है। अनल दा उर्फ पतिराम मांझी के मारे जाने की खबर पर गांव में कोई बोलने को तैयार नहीं है।

गिरिडीह जिले के पीरटांड़ थाना क्षेत्र स्थित दीवानडीह झरहा गांव, जो लंबे समय से दहशत के साये में रहा है, वहां पुलिस की चहलकदमी भी बढ़ी हुई है। अनल दा के गांव का जायजा लिया गया तो गलियां लगभग सुनसान नजर आईं। मुख्य रास्ते से सटे खपरैल के मकानों के दरवाजे बंद थे। गांव में कहीं भी पुरुष दिखाई नहीं दिए।

गलियों और घरों की देहरी पर कुछ महिलाएं जरूर नजर आईं, लेकिन उनके चेहरे पर डर और अनकही आशंका साफ झलक रही थी। अनल दा को जानता हर कोई है, लेकिन कोई उनके बारे में कुछ बोलने को तैयार नहीं है। कुछ महिलाएं तो पहचानने से भी इंकार करती है। मुठभेड़ की घटना के बारे में पूछने पर वे नजरें चुराते हुए चुप हो जाती थीं। कोई भी बोलने को तैयार नहीं था।

खपरैल का मकान, लेकिन घर पूरी तरह खाली
अनल दा का घर गांव की मुख्य सड़क से सटा एक साधारण खपरैल का मकान बताया जा रहा है। मकान में ताला नहीं लगा था, लेकिन घर पूरी तरह खाली मिला। ग्रामीणों के अनुसार उसके भाई और अन्य परिजन मजदूरी के लिए बाहर गए हुए हैं। गांव में रोजगार के साधन बेहद सीमित हैं, जिस कारण अधिकांश पुरुष रोजी-रोटी की तलाश में बाहर पलायन करने को मजबूर हैं।

करोड़ का इनामी, कई नाम और लंबा आपराधिक इतिहास
पुलिस के मुताबिक अनल दा का असली नाम पतिराम मांझी था। वह दीवानडीह झरहा निवासी लेंगरा मांझी का बेटा था। माओवादी संगठन में वह कई नामों से जाना जाता था और झारखंड सहित सीमावर्ती राज्यों में उसका बड़ा नेटवर्क था।

गिरिडीह जिले के पीरटांड़, खुखरा, मधुबन, निमियाघाट समेत कई थानों में उसके खिलाफ दर्जनों संगीन मामले दर्ज थे। सुरक्षा एजेंसियों के लिए वह लंबे समय से सिरदर्द बना हुआ था।

अनल दा की कहानी भी इसी सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन की उपज मानी जा रही है।सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई से भले ही बड़े नक्सली ढेर हो रहे हों, लेकिन अनल दा के गांव का सन्नाटा एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।

क्या केवल बंदूक के दम पर नक्सल समस्या का समाधान संभव है, या फिर विकास, भरोसे और मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिशें भी उतनी ही जरूरी हैं? दीवानडीह झरहा की खामोशी इस सवाल का जवाब अब भी तलाश रही है।

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