दिल्ली-आइजोल फ्लाइट में देवदूत बने 3 डॉक्टर, 40% ऑक्सीजन लेवल पर पहुंची महिला की हवा में बचाई जान
उड़ान के बीच अचानक बिगड़ी 32 वर्षीय डायलिसिस मरीज की हालत, डॉक्टरों ने संभाला मोर्चा; आइजोल पहुंचने के बाद इमरजेंसी इंट्यूबेशन और ICU में भर्ती से मिली जिंदगी

नई दिल्ली। दिल्ली से मिजोरम की राजधानी आइजोल जा रही इंडिगो की एक फ्लाइट में 3 अक्टूबर 2026 को उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब एक महिला यात्री की उड़ान के दौरान अचानक तबीयत बिगड़ गई। महिला को सांस लेने में गंभीर परेशानी होने लगी और उसका ऑक्सीजन स्तर बेहद खतरनाक स्थिति तक गिर गया।
हालात बिगड़ते देख केबिन क्रू ने विमान में किसी डॉक्टर की मौजूदगी के लिए आपातकालीन घोषणा की। इसके बाद मिजोरम के तीन डॉक्टर तुरंत महिला यात्री की मदद के लिए आगे आए। विमान में मौजूद इन तीनों डॉक्टरों ने सीमित चिकित्सा संसाधनों के बीच इलाज शुरू किया और महिला को सुरक्षित आइजोल पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
40 प्रतिशत तक गिर गया था ऑक्सीजन लेवल
महिला की उम्र 32 वर्ष बताई गई है और वह लंबे समय से गुर्दे की बीमारी से जूझ रही थी। वह नियमित रूप से डायलिसिस कराती थी और इलाज के बाद दिल्ली से मिजोरम लौट रही थी।
आइजोल पहुंचने से करीब एक घंटे पहले उसकी हालत अचानक तेजी से बिगड़ गई। सांस लेने में परेशानी बढ़ गई और जांच के दौरान उसकी ऑक्सीजन संतृप्ति करीब 40 प्रतिशत पाई गई। यह बेहद गंभीर स्थिति मानी जाती है।
विमान में मौजूद गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. बेंजामिन खियांग्ते, बाल रोग विशेषज्ञ एवं क्रिटिकल केयर सुपर-स्पेशलिस्ट डॉ. एफ रेमथांगपुई उर्फ अरेमी और जनरल सर्जन डॉ. विली लालहरुइतलुआंगा ने तत्काल इलाज शुरू किया।
इनहेलर और ऑक्सीजन से शुरू किया इलाज
डॉक्टरों ने महिला को इनहेलर और ऑक्सीजन दी। हालांकि विमान में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं और करीब चार लीटर प्रति मिनट की दर से ही ऑक्सीजन दी जा सकती थी।
इसके बाद डॉक्टरों ने स्टेरॉयड दिया, जिसके बाद महिला का ऑक्सीजन स्तर कुछ समय के लिए 70 से 80 प्रतिशत तक पहुंचा। इस अस्थायी सुधार ने डॉक्टरों को तत्काल विमान का रुख बदलने के बजाय आइजोल तक उड़ान जारी रखने का निर्णय लेने में मदद की।
विमान में पूर्व केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री और मिजोरम के नवनियुक्त भाजपा प्रभारी भागवत किशनराव कराड भी मौजूद थे। उन्होंने शुरुआत में बीमार महिला की मदद की थी।
पायलट ने कोलकाता डायवर्ट करने का दिया था विकल्प
महिला की गंभीर स्थिति को देखते हुए पायलट ने विमान को कोलकाता की ओर मोड़ने का विकल्प दिया था। हालांकि, डॉक्टरों की निगरानी में महिला की हालत में अस्थायी सुधार होने के बाद आइजोल की उड़ान जारी रखने का फैसला किया गया।
लेकिन कुछ समय बाद महिला का ऑक्सीजन स्तर दोबारा गिरने लगा। डॉक्टरों ने ऐसी स्थिति में इंट्यूबेशन पर विचार किया। इंट्यूबेशन एक आपात चिकित्सा प्रक्रिया है, जिसमें मरीज के वायुमार्ग को खुला रखने और सांस लेने में मदद करने के लिए श्वासनली में एक ट्यूब डाली जाती है।
हालांकि विमान में इस प्रक्रिया के लिए जरूरी उपकरण उपलब्ध नहीं थे। ऐसे में डॉक्टरों ने विमान के उतरते ही महिला को तत्काल उन्नत चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की तैयारी शुरू कर दी।
एयरपोर्ट पर एम्बुलेंस तैयार, फिर अस्पताल में इंट्यूबेशन
डॉक्टरों ने चालक दल से लेंगपुई हवाईअड्डे पर एम्बुलेंस और जरूरी चिकित्सा सहायता तैयार रखने को कहा। विमान के उतरने के बाद एम्बुलेंस में ऑक्सीजन की व्यवस्था थी, लेकिन उन्नत श्वसन सहायता के लिए जरूरी उपकरण मौजूद नहीं थे।
इसके बाद डॉक्टर महिला को सीधे लेंगपुई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए। वहां जरूरी आपात उपकरण उपलब्ध थे और महिला को स्ट्रेचर पर ही इंट्यूबेट किया गया।
इलाज के बाद महिला के ऑक्सीजन स्तर में सुधार हुआ। अस्पताल में बेहतर ऑक्सीजन सपोर्ट मिलने के बाद उसकी हालत धीरे-धीरे स्थिर होने लगी।
ICU में पहुंची महिला, वेंटिलेटर पर रखा गया
इसके बाद डॉक्टरों ने आइजोल के अस्पतालों से संपर्क कर महिला के लिए ICU बेड की व्यवस्था शुरू की। आखिरकार एलआरएम अस्पताल में बेड उपलब्ध हुआ।
डॉ. विली और डॉ. रेमथांगपुई एम्बुलेंस में महिला के साथ आइजोल पहुंचे। महिला को वेंटिलेटर पर रखा गया और बाद में उसका डायलिसिस भी किया गया।
डॉ. बेंजामिन खियांग्ते के मुताबिक, रात तक महिला की हालत में काफी सुधार हुआ और उसने बातचीत करना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि समय पर मिली चिकित्सा सहायता इस पूरे मामले में बेहद महत्वपूर्ण रही।
डॉक्टर बोले, ‘मुझे उम्मीद नहीं थी कि वह बच पाएगी’
डॉ. खियांग्ते ने बताया कि अगर महिला को समय पर चिकित्सा सहायता नहीं मिलती तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती थी। उन्होंने कहा कि उन्हें एक समय ऐसा लगा था कि शायद महिला को बचाना मुश्किल होगा।
डॉक्टर के अनुसार, महिला के फेफड़ों में अतिरिक्त तरल पदार्थ जमा हो गया था, जिससे उसकी सांस लेने की परेशानी और बढ़ सकती थी। विमान में मौजूद सीमित संसाधनों के बावजूद तीनों डॉक्टरों ने स्थिति को संभालने की कोशिश जारी रखी।
डॉ. खियांग्ते ने कहा कि तीनों डॉक्टरों ने संकट में फंसे एक सहयात्री की मदद के लिए वही किया, जो उस समय उनके लिए संभव और जरूरी था।
तीनों डॉक्टरों की भूमिका बनी अहम
डॉ. बेंजामिन खियांग्ते आइजोल के मिशन वेंग में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और लिवर सेंटर चलाते हैं। डॉ. एफ रेमथांगपुई आइजोल सिविल अस्पताल में कार्यरत हैं और मिजोरम की एकमात्र क्रिटिकल केयर सुपर-स्पेशलिस्ट हैं।
वहीं डॉ. विली लालहरुइतलुआंगा पहले जोरम मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल और एलआरएम अस्पताल में काम कर चुके हैं। फिलहाल वह देहरादून में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी में पोस्ट-डॉक्टोरल सुपर-स्पेशियलिटी डिग्री एमसीएच की पढ़ाई कर रहे हैं।
आसमान में अचानक बिगड़ी एक यात्री की हालत के बीच इन तीन डॉक्टरों का समय पर आगे आना बेहद अहम साबित हुआ। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने महिला को प्राथमिक चिकित्सा सहायता दी, एयरपोर्ट पर आगे के इलाज की व्यवस्था कराई और अस्पताल पहुंचने तक उसकी हालत पर नजर बनाए रखी। समय पर मिले इस उपचार ने महिला को गंभीर स्थिति से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।








