Jharkhand High Court: 590 अंक के बावजूद JPSC ने नहीं किया चयन, पति के नाम वाले जाति प्रमाणपत्र मामले में हाईकोर्ट ने पलटा फैसला, JPSC को 8 हफ्ते में नियुक्ति की अनुशंसा का आदेश
Jharkhand High Court ने JPSC भर्ती मामले में चंचला कुमारी के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने सरकारी अधिकारी की गलती का खामियाजा अभ्यर्थी को नहीं देने और JPSC को 8 हफ्ते में नियुक्ति की अनुशंसा का आदेश दिया।

रांची: जाति प्रमाण पत्र को लेकर हाईकोर्ट ने बड़ा अहम फैसला सुनाया है। पति के नाम जारी जाति प्रमाण पत्र को लेकर हाईकोर्ट ने जेपीएससी को नियुक्ति का आदेश दिया है। झारखंड हाईकोर्ट ने JPSC की भर्ती प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में ये फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी अधिकारी की गलती का खामियाजा किसी अभ्यर्थी को नहीं भुगतना पड़ सकता।
जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने चंचला कुमारी की उम्मीदवारी पर पुनर्विचार करते हुए नियुक्ति की अनुशंसा करने का निर्देश JPSC को दिया है।अदालत ने JPSC को आठ सप्ताह के भीतर आवश्यक अनुशंसा करने और राज्य सरकार को अनुशंसा प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश दिया है।
590 अंक हासिल करने के बाद भी नहीं हुआ था चयन
चंचला कुमारी ने 7वीं से 10वीं झारखंड संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा-2021 के तहत वर्ग-II अधिकारी पद पर SC श्रेणी में नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। वह प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा में सफल हुईं और इंटरव्यू के लिए भी चयनित हुई थीं।दस्तावेज सत्यापन के दौरान JPSC ने उनके जाति प्रमाणपत्र पर आपत्ति जताई। चंचला ने 27 मार्च 2019 को जारी जाति प्रमाणपत्र आवेदन में लगाया था, जो उनके पति के नाम के आधार पर जारी हुआ था। बाद में उन्होंने 9 मई 2022 को पिता के नाम से जारी जाति प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किया।
इसके बावजूद 31 मई 2022 को जारी परिणाम में उनका नाम शामिल नहीं किया गया। चंचला ने कुल 590 अंक हासिल किए थे, जबकि SC श्रेणी में अंतिम चयनित अभ्यर्थी का कटऑफ 583 अंक था। JPSC ने उनकी उम्मीदवारी स्वीकार नहीं करने का आधार पति के नाम से जारी जाति प्रमाणपत्र को बनाया था।
जाति प्रमाणपत्र में गलती अभ्यर्थी की नहीं, अधिकारी की थी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि चंचला कुमारी ने जाति प्रमाणपत्र के लिए 4 जनवरी 2019 को आवेदन किया था। इसके बाद 27 मार्च 2019 को कोडरमा के तत्कालीन SDO कार्यालय से प्रमाणपत्र जारी किया गया।अदालत ने माना कि प्रमाणपत्र पति के नाम के आधार पर जारी होना अभ्यर्थी की गलती नहीं थी, बल्कि यह प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारी की त्रुटि थी।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि 25 फरवरी 2019 का वह सरकारी पत्र, जिसके आधार पर जाति प्रमाणपत्र पिता के नाम से जारी करने की बात कही गई थी, न तो राजपत्र में प्रकाशित हुआ था और न ही उसे सरकारी अधिसूचना, संकल्प या नियम का दर्जा प्राप्त था। इसलिए उस पत्र को कानून का बल प्राप्त नहीं था।
विज्ञापन में सिर्फ पिता के नाम की अनिवार्यता नहीं थी
हाईकोर्ट ने JPSC के इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया कि चंचला का प्रमाणपत्र भर्ती विज्ञापन की शर्तों के अनुरूप नहीं था।अदालत ने कहा कि विज्ञापन में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था कि जाति प्रमाणपत्र केवल पिता के नाम पर ही जारी होना चाहिए। संबंधित प्रोफार्मा में पिता के साथ पति का नाम दर्ज करने का भी प्रावधान था।
कोर्ट ने यह भी पाया कि प्रमाणपत्र सक्षम अधिकारी यानी SDO द्वारा जारी किया गया था और निर्धारित प्रारूप में था। दोनों जाति प्रमाणपत्रों में अभ्यर्थी का स्थायी पता और जाति भी समान थी।ऐसे में केवल इस आधार पर उम्मीदवारी खारिज करना उचित नहीं माना जा सकता कि पहले जारी प्रमाणपत्र में पिता के बजाय पति का नाम दर्ज था।
सरकारी गलती के लिए अभ्यर्थी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में माना कि चंचला कुमारी ने निर्धारित समय सीमा के भीतर उचित प्रारूप में जाति प्रमाणपत्र जमा किया था। विवाद केवल इस बात को लेकर था कि प्रमाणपत्र पति के नाम के आधार पर जारी हुआ था।जबकि प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में गलती सरकारी अधिकारी की ओर से हुई थी।
साथ ही, चंचला की जाति और झारखंड निवासी होने को लेकर भी कोई विवाद नहीं था।ऐसे में उनकी उम्मीदवारी को खारिज करना अदालत ने उचित नहीं माना। कोर्ट ने साफ किया कि सरकारी व्यवस्था में हुई गलती की सजा किसी अभ्यर्थी को नहीं दी जा सकती।
JPSC को 8 सप्ताह में अनुशंसा, सरकार को 4 सप्ताह में नियुक्ति का आदेश
हाईकोर्ट ने चंचला कुमारी की रिट याचिका स्वीकार करते हुए JPSC को आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति के लिए आवश्यक अनुशंसा करने का निर्देश दिया है।वहीं, JPSC की अनुशंसा प्राप्त होने के बाद राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश दिया गया है।
इस फैसले से भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेजों और सरकारी अधिकारियों की ओर से होने वाली त्रुटियों को लेकर महत्वपूर्ण संदेश गया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी अभ्यर्थी की ओर से नियमों का उल्लंघन नहीं हुआ है और गलती सरकारी स्तर पर हुई है, तो उसका खामियाजा अभ्यर्थी के भविष्य पर नहीं डाला जा सकता।









