रांची : महिला वकील को वकील ने पीटा, कोर्ट ने वकील को सुनायी 2 साल की सजा, जानिये कोर्ट में क्यों हुई थी मारपीट

Ranchi: A lawyer beat up a female lawyer, the court sentenced the lawyer to two years in prison, find out why the fight took place in the court.

रांची की एमपी/एमएलए कोर्ट ने महिला वकील से मारपीट के मामले में अधिवक्ता महेश तिवारी को दोषी ठहराते हुए विभिन्न धाराओं के तहत सजा सुनाई है। यह मामला वर्ष 2012 का है, जिसकी सुनवाई के बाद अदालत ने सख्त रुख अपनाया।
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रांची। कोर्ट परिसर में अनुशासन और सुरक्षा से जुड़े एक अहम मामले में रांची की मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी सह विशेष एमपी/एमएलए कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने महिला अधिवक्ता के साथ मारपीट के 14 साल पुराने मामले में अधिवक्ता महेश तिवारी को दोषी करार दिया है। मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत दोष सिद्ध होने पर सजा निर्धारित की।

कोर्ट ने सुनायी सजा
अदालत ने धारा 354 के तहत 2 वर्ष की सजा, धारा 323 के तहत 1 वर्ष की सजा और धारा 341 के तहत 1 वर्ष की सजा सुनाई है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि न्यायालय परिसर में इस तरह की घटनाएं बेहद गंभीर हैं और इन्हें किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

जानिये क्या है पूरा मामला
यह मामला 1 मई 2012 का है, जब झारखंड हाईकोर्ट परिसर में तत्कालीन जस्टिस एन.एन. तिवारी की अदालत के बाहर यह घटना हुई थी। आरोप के मुताबिक, अधिवक्ता महेश तिवारी ने एक महिला अधिवक्ता के साथ मारपीट की थी, जिससे न्यायालय परिसर में हड़कंप मच गया था। इस घटना के बाद रांची के डोरंडा थाना में कांड संख्या 191/2012 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

वकील ने दर्ज करायी थी शिकायत
इस मामले की शिकायत हाईकोर्ट की अधिवक्ता ऋतु कुमार ने दर्ज कराई थी। लंबे समय तक चली सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद आखिरकार अदालत ने अपना फैसला सुनाया। इस दौरान अभियोजन पक्ष ने घटना से जुड़े विभिन्न पहलुओं को अदालत के सामने रखा, जिसके आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया गया।

कोर्ट ने की बड़ी टिप्पणी
अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि न्यायालय परिसर में कार्यरत अधिवक्ताओं और अन्य लोगों के बीच अनुशासन और आपसी सम्मान बनाए रखना बेहद जरूरी है। इस तरह की घटनाएं न केवल न्यायिक गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं, बल्कि कानून व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती हैं।

फैसले के बाद हाईकोर्ट और सिविल कोर्ट के कई अधिवक्ताओं ने इसका स्वागत किया है। अधिवक्ताओं का मानना है कि इस तरह के मामलों में सख्त कार्रवाई से न्यायालय परिसर में अनुशासन बनाए रखने में मदद मिलेगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगेगा।

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