बूंद-बूंद पानी देकर उगाए टमाटर, अब सड़क पर फेंकने की नौबत! ₹100 कैरेट ने किसान की तोड़ी कमर, आखिर क्यों नहीं बिक रही मेहनत?

Latur Farmers News: कर्ज लेकर खेती, टैंकर से हजारों रुपये का पानी और दिन-रात की मेहनत के बाद तैयार हुई फसल, लेकिन मंडी में ऐसा गिरा भाव कि तुड़ाई और ट्रांसपोर्ट का खर्च निकालना भी मुश्किल

लातूर। जिस फसल को किसान ने बूंद-बूंद पानी देकर बचाया, उसे तैयार होने के बाद सड़क पर फेंकने की नौबत आ जाए तो उसकी पीड़ा का अंदाजा लगाना मुश्किल है। महाराष्ट्र के लातूर जिले के दापक्याल गांव से सामने आई किसान की यह कहानी खेती की उस हकीकत को दिखाती है, जहां कभी सूखा किसान की चिंता बढ़ाता है तो कभी बंपर पैदावार उसकी मेहनत पर पानी फेर देती है।

दापक्याल गांव के किसान मैनोद्दीन शेख ने ब्याज पर पैसे लेकर टमाटर की खेती की थी। बारिश कम होने के कारण फसल को बचाने के लिए उन्होंने हजारों रुपये खर्च कर टैंकरों से पानी मंगवाया। बूंद-बूंद पानी देकर फसल को किसी तरह जिंदा रखा और उम्मीद थी कि टमाटर तैयार होने के बाद अच्छी कमाई होगी।

लेकिन जब फसल बाजार में पहुंची तो किसान की सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं।

जिस टमाटर को बचाने में खर्च किए हजारों, उसकी कीमत रह गई ₹100 कैरेट

फसल तैयार होने के बाद मंडी में टमाटर की कीमत इतनी गिर गई कि किसान को एक कैरेट के महज करीब 100 रुपये मिलने लगे। कई जगह थोक कीमतें इससे भी नीचे जाने की स्थिति बनी।

ऐसे में किसान के सामने बड़ा सवाल था—फसल बेचे तो किस कीमत पर?

टमाटर तोड़ने के लिए मजदूरों को पैसे देने पड़ते हैं। इसके बाद क्रेट की पैकिंग, लोडिंग और मंडी तक पहुंचाने का परिवहन खर्च अलग। जब टमाटर की बिक्री से मिलने वाली रकम इन खर्चों के आसपास भी नहीं पहुंची तो किसान के लिए फसल को खेत से निकालना भी घाटे का सौदा बन गया।

आखिरकार मैनोद्दीन शेख को अपनी मेहनत से तैयार टमाटरों को खेत और सड़क पर फेंकने के लिए मजबूर होना पड़ा।

बूंद-बूंद पानी देकर फसल बचाई, लेकिन बाजार ने उम्मीदें सुखा दीं

किसान के लिए सबसे दर्दनाक बात यह है कि उसने फसल को सूखने से बचाने के लिए पानी तक खरीदा था। बारिश ने साथ नहीं दिया तो टैंकरों के सहारे टमाटर की फसल को खड़ा रखा गया।

जिस फसल को किसान ने अपने बच्चों की तरह पाला, उसके तैयार होने के बाद उसे बाजार में उचित कीमत नहीं मिली।

यानी टमाटर की फसल तो बच गई, लेकिन उसकी कीमत ने किसान की उम्मीदों को खत्म कर दिया।

आखिर क्यों औंधे मुंह गिर गए टमाटर के दाम?

टमाटर की कीमतों में गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण बाजार में आवक और मांग का असंतुलन माना जा रहा है।

मानसून के दौरान और उसके बाद मौसम अनुकूल रहने पर लातूर और आसपास के इलाकों से बड़ी मात्रा में टमाटर एक साथ मंडियों में पहुंच गए। जब बाजार में मांग की तुलना में सप्लाई ज्यादा हो जाती है तो कीमतों पर सीधा असर पड़ता है।

अत्यधिक आवक के कारण थोक बाजार में टमाटर के भाव कई बार ₹2 से ₹5 प्रति किलो तक नीचे जाने की स्थिति बन जाती है। ऐसे में किसान के लिए तुड़ाई, पैकिंग और परिवहन का खर्च निकालना तक मुश्किल हो जाता है।

टमाटर को ज्यादा दिन रोक भी नहीं सकता किसान

टमाटर ऐसी फसल है जिसे लंबे समय तक सुरक्षित रखना आसान नहीं होता। इसकी शेल्फ लाइफ कम होती है और पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं नहीं होने के कारण किसान फसल को लंबे समय तक रोककर बेहतर कीमत का इंतजार नहीं कर सकता।

नतीजा यह होता है कि किसान को मजबूरी में कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ती है। और जब बिक्री की कीमत भी लागत से कम हो जाए तो कई किसान फसल की तुड़ाई तक नहीं करते।

दूसरी तरफ प्याज के दाम बढ़ने लगे

एक तरफ टमाटर किसानों को कम कीमत ने परेशान किया है, वहीं दूसरी तरफ प्याज के बाजार में अलग तस्वीर देखने को मिल रही है।

पिछले मौसम में अनियमित बारिश, अत्यधिक गर्मी और नमी में बदलाव के कारण भंडारण में रखे गए रबी प्याज का काफी हिस्सा खराब होने की बात सामने आई। वहीं नई खरीफ प्याज की बुआई और फसल आने में समय लगने के कारण बाजार में पुराना स्टॉक कम हुआ।

आवक घटने का असर प्याज की कीमतों पर पड़ा और थोक के साथ खुदरा बाजार में भी महंगाई देखने को मिली।

किसान के सामने फिर वही सवाल—मेहनत की कीमत कौन तय करेगा?

लातूर के किसान की यह तस्वीर सिर्फ एक खेत या एक फसल की कहानी नहीं है। यह उस समस्या की ओर इशारा करती है, जहां किसान को कभी फसल खराब होने का डर सताता है तो कभी फसल अच्छी होने पर कीमत गिरने का।

किसान ने कर्ज लिया, पानी खरीदा, मजदूर लगाए और महीनों मेहनत की। फसल बच भी गई और तैयार भी हो गई, लेकिन बाजार भाव ने पूरी गणित बिगाड़ दी।

 

Anita Nishad

Anita Nishad is a dedicated and insightful journalist currently serving as a key voice at HPBL News. With a deep-rooted passion for storytelling and truth-seeking, Anita has become a trusted name in digital and broadcast journalism, particularly known for her ability to bring grassroots issues to the forefront.

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