“मैं मर्द हूं, मुझसे बर्दाश्त नहीं होता…” एक ‘राजा बेटे’ की कहानी, जो सोचने पर मजबूर कर देगी
बचपन से सिखाई गई मर्दानगी कैसे लड़कियों की आजादी, आवाज और बराबरी को चुनौती देने वाली मानसिकता में बदल जाती है, यह लेख उसी सोच पर तीखा प्रहार करता है

मैं मर्द हूं। किसी देश, किसी राज्य या किसी शहर का मर्द समझ लो, मेरी पहचान सबसे पहले यही है कि मैं मर्द हूं। मेरे जन्म पर जश्न मनाया जाता है और जन्म लेते ही मेरे भीतर मर्दानगी भरने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। मां की गोद में आते ही मैं बन जाता हूं ‘राजा बेटा’।
मेरी हर जिद पूरी होती है। मैं देर रात घर लौटूं तो सवाल नहीं पूछे जाते। मुझे भूख लगे तो आधी रात में भी खाना तैयार मिलता है। मेरी गलतियों को अक्सर बचपन की शरारत कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि लड़कियों के लिए बचपन से ही नियमों की लंबी सूची तैयार रहती है।
मुझे बंदूक और गाड़ियों से खेलने दिया जाता है। खिलौनों से लेकर बातचीत तक में मुझे बार-बार यह अहसास कराया जाता है कि मुझे ‘मर्द’ बनना है। लड़कियों से दूरी रखना, भावनाएं न दिखाना और हर स्थिति में खुद को ताकतवर साबित करना जैसे मेरी पहचान का हिस्सा बन जाते हैं।
धीरे-धीरे मैं बड़ा होता हूं और मेरे भीतर यह विश्वास मजबूत होने लगता है कि लड़कियों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसका फैसला भी मैं कर सकता हूं। लड़की किसी लड़के से बात करे तो सवाल उठता है। रात में बाहर निकले तो सवाल उठता है। अपनी पसंद के कपड़े पहने तो सवाल उठता है। बाइक चलाए तो सवाल उठता है। अपनी पसंद से करियर चुने तो सवाल उठता है।
लेकिन मेरे लिए वही नियम क्यों नहीं हैं?
मैं सड़क पर किसी लड़की को घूरूं, उसका पीछा करूं, उसके पहनावे पर टिप्पणी करूं या उसे अपमानित करूं तो दोस्त मेरी पीठ थपथपाते हैं। इसे ‘मर्दानगी’ कहा जाता है। लड़की विरोध करे तो उसकी ‘औकात’ याद दिलाने की बात होती है।
यहीं से समस्या शुरू होती है।
किसी लड़की का किसी लड़के के साथ घूमना मुझे परेशान करता है। उसकी दोस्ती मुझे खटकती है। उसकी आजादी मुझे चुनौती लगती है। वह मेरी बात न माने तो मेरा अहंकार आहत होता है। मैं उसके ‘ना’ को जवाब नहीं, चुनौती समझने लगता हूं।
और जब यही मानसिकता अपराध की सीमा पार कर जाती है तो उसके पीछे भी वही सोच दिखाई देती है, जिसमें लड़की की इच्छा और उसकी सहमति को महत्वहीन समझ लिया जाता है।
फिर जब महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर आवाज उठती है, मैं सवाल करने लगता हूं कि सभी पुरुषों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है। मैं कहता हूं कि मैंने तो कोई अपराध नहीं किया। लेकिन क्या सिर्फ अपराध न करना ही पर्याप्त है?
क्या किसी महिला को घूरना गलत नहीं है? क्या उसका पीछा करना गलत नहीं है? क्या उसे वस्तु की तरह देखना गलत नहीं है? क्या महिलाओं को गालियां देकर अपमानित करना गलत नहीं है? क्या उनकी आजादी पर रोक लगाने की मानसिकता गलत नहीं है?
महिला सुरक्षा का सवाल सिर्फ अपराध होने के बाद शुरू नहीं होता। वह उस सोच से शुरू होता है जिसमें लड़की की स्वतंत्रता को समस्या माना जाता है और लड़के के आचरण को स्वाभाविक।
लड़कियों को रात में बाहर निकलने से रोक देना सुरक्षा नहीं है। सवाल यह भी होना चाहिए कि उन्हें डर किससे है और उस डर को पैदा करने वाली मानसिकता क्यों बनी हुई है।
किसी महिला के कपड़े उसके खिलाफ हिंसा का कारण नहीं हो सकते। उसका अकेले बाहर निकलना उसकी गलती नहीं है। किसी पुरुष का उसे पसंद करना उसे उस महिला पर अधिकार नहीं देता। प्रेम, आकर्षण या विवाह की इच्छा में सबसे जरूरी चीज सहमति है और किसी भी रिश्ते में ‘ना’ का अर्थ ‘ना’ ही होता है।
फिर सवाल आता है उस ‘राजा बेटे’ का, जिसे बचपन से यह सिखाया गया कि उसकी हर इच्छा पूरी होनी चाहिए।
उसे यह कौन समझाएगा कि मर्दानगी किसी महिला को नियंत्रित करने का नाम नहीं है? कि ताकत का मतलब किसी कमजोर पर अधिकार जमाना नहीं है? कि किसी की स्वतंत्रता छीनना बहादुरी नहीं है? कि सम्मान मांगने से पहले सम्मान देना सीखना पड़ता है?
मैं मर्द हूं, लेकिन मेरी मर्दानगी किसी लड़की की आजादी से छोटी नहीं होनी चाहिए।
मैं मर्द हूं, लेकिन किसी महिला की आवाज दबाकर खुद को बड़ा साबित करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
मैं मर्द हूं, लेकिन किसी लड़की के ‘ना’ को स्वीकार करना मेरी कमजोरी नहीं, मेरी जिम्मेदारी होनी चाहिए।
क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि मैं कितना मर्द हूं। असली सवाल यह है कि मेरी मर्दानगी किसी दूसरे इंसान की जिंदगी, आजादी और सम्मान को कितना सुरक्षित रखती है।
‘राजा बेटा’ बनाकर पाले गए बच्चे को अगर बराबरी, सम्मान और सहमति की शिक्षा नहीं दी गई, तो वही बच्चा बड़ा होकर उस समाज का हिस्सा बन सकता है जहां महिलाओं से उनकी आजादी का हिसाब मांगा जाता है।
मर्दानगी की शुरुआत किसी लड़की को नियंत्रित करने से नहीं, बल्कि उसके इंसान होने और उसके अधिकारों को स्वीकार करने से होती है।









