Food Inflation: सिर्फ चीनी ही नहीं… अंडा, दाल, तेल और सब्जियां भी हुईं महंगी! त्योहार से पहले क्यों बढ़ रही है रसोई की टेंशन?

Food Inflation: त्योहारों का मौसम शुरू होते ही घरों का बजट बिगड़ता नजर आ रहा है। चीनी की कीमतों में करीब 40 फीसदी तक बढ़ोतरी की बात सामने आ रही है, वहीं प्याज, दाल, चावल, खाने के तेल और सब्जियों के दाम भी बढ़े हैं। अंडे की कीमतों पर भी चारे की बढ़ती लागत का असर बताया जा रहा है। ऐसे में सवाल है कि आखिर खाद्य वस्तुओं की कीमतों में इतनी तेजी क्यों आई है और क्या इसके पीछे सिर्फ एथेनॉल की कहानी है?
नई दिल्ली। त्योहारों के दौरान आमतौर पर बाजार में खरीदारी बढ़ जाती है। लोग कपड़े, मिठाइयां और घरेलू सामान खरीदने के साथ-साथ राशन की भी ज्यादा खरीदारी करते हैं। लेकिन इस बार बढ़ती खाद्य कीमतों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
चीनी, प्याज, दाल, चावल, सब्जियां और खाने के तेल जैसी रोजमर्रा की जरूरत की चीजों के दाम बढ़ने से घरेलू बजट पर सीधा असर पड़ रहा है। चीनी की कीमत तो करीब 40 फीसदी तक बढ़ने की बात सामने आ रही है और कुछ बाजारों में यह करीब 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है।
RBI के आंकड़ों में भी दिखी कीमतों में तेजी
RBI की अगस्त की मंथली रिपोर्ट के मुताबिक, 1 से 21 अगस्त के दौरान कई जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई।
इस दौरान प्याज के दाम में 11 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हुई। इसके पीछे कई कारण बताए गए हैं, जिनमें खराब मौसम, अल नीनो, गल्फ क्राइसिस और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी आपूर्ति संबंधी चुनौतियां शामिल हैं।
वहीं चावल की कीमत में 0.1 फीसदी और दालों की कीमत में 0.6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। अलग-अलग दालों में चना दाल करीब 0.5 फीसदी और अरहर दाल करीब 0.4 फीसदी महंगी हुई।
खाने के तेल ने भी बढ़ाई रसोई की परेशानी
खाद्य तेल भी महंगाई से अछूते नहीं रहे। आंकड़ों के मुताबिक सरसों के तेल की कीमत में करीब 1.6 फीसदी और मूंगफली के तेल में करीब 1 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
इसके अलावा सूरजमुखी तेल और पाम ऑयल की कीमतों में भी करीब 0.9 फीसदी की वृद्धि देखने को मिली है।
इन चीजों की कीमत बढ़ने का असर सीधे घर के महीनेभर के राशन के बजट पर पड़ता है।
चीनी महंगी होने के पीछे एथेनॉल कितना जिम्मेदार?
चीनी की कीमतों में तेजी की चर्चा के बीच एथेनॉल उत्पादन को भी एक वजह के तौर पर देखा जा रहा है।
भारत में एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्का और टूटे हुए चावल का इस्तेमाल किया जाता है। दूसरी तरफ यही चीजें पोल्ट्री उद्योग में पशु आहार के तौर पर भी इस्तेमाल होती हैं।
एथेनॉल उत्पादन के लिए इन अनाजों की मांग बढ़ने पर पोल्ट्री फीड की लागत बढ़ सकती है। इसका असर आगे चलकर मुर्गी पालन की लागत और अंडों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
यानी एथेनॉल का असर सिर्फ चीनी के बाजार तक सीमित रहने की बजाय कुछ हद तक पोल्ट्री सेक्टर तक भी पहुंच सकता है।
अंडे महंगे होने की एक वजह चारे की बढ़ती लागत
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पोल्ट्री फीड की लागत बढ़ना अंडों की कीमतों में तेजी की एक वजह हो सकती है। मक्का और टूटे हुए चावल की मांग में बढ़ोतरी होने से चारे की लागत प्रभावित होती है।
जब पोल्ट्री फार्म की उत्पादन लागत बढ़ती है तो उसका असर आखिरकार बाजार में मिलने वाले अंडों की कीमत पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, अंडों की कीमत सिर्फ एथेनॉल की वजह से तय नहीं होती। उत्पादन, मौसम, मांग, परिवहन और स्थानीय बाजार की स्थिति भी इसमें अहम भूमिका निभाती है।
होर्मुज स्ट्रेट की परेशानी से क्यों महंगी हो रही चीजें?
खाद्य महंगाई के पीछे एक और बड़ी वजह मध्य-पूर्व में जारी तनाव और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी आपूर्ति चुनौतियां बताई जा रही हैं।
यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा और व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यहां परिवहन प्रभावित होने पर सिर्फ कच्चे तेल की सप्लाई ही नहीं, बल्कि कई दूसरी वस्तुओं के आयात और परिवहन की लागत पर भी असर पड़ सकता है।
खाद की सप्लाई पर असर पड़ने की स्थिति में कृषि लागत बढ़ सकती है, जिसका प्रभाव आगे चलकर फसलों और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
खाने के तेल के आयात पर भी पड़ रहा असर
भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा खाद्य तेल के आयात से पूरा करता है। पाम ऑयल, सूरजमुखी तेल और सोयाबीन तेल जैसे उत्पादों की वैश्विक सप्लाई और समुद्री परिवहन में किसी तरह की बाधा आने पर आयात लागत बढ़ सकती है।
यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परिवहन और सप्लाई चेन में आने वाला दबाव धीरे-धीरे घरेलू बाजार तक पहुंच सकता है।
कच्चे तेल की कीमत बढ़ी तो महंगा हो सकता है सामान
महंगाई का एक और रास्ता पेट्रोल-डीजल और लॉजिस्टिक्स लागत से होकर आता है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से परिवहन महंगा हो सकता है।
ट्रक, कंटेनर और दूसरे मालवाहक वाहनों की लागत बढ़ने पर सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना महंगा पड़ता है। आखिरकार इसका कुछ बोझ उपभोक्ताओं पर भी आ सकता है।
यानी खेत से मंडी और मंडी से दुकान तक सामान पहुंचाने की लागत बढ़ती है तो इसका असर अंतिम कीमत में दिखाई दे सकता है।
सिर्फ एथेनॉल को जिम्मेदार मानना सही नहीं
चीनी और अंडे की कीमतों में तेजी के बीच एथेनॉल को एक संभावित कारण माना जा रहा है, लेकिन पूरी खाद्य महंगाई के लिए सिर्फ एथेनॉल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय बाजार, मौसम, आयात लागत, कच्चा तेल, परिवहन, घरेलू मांग और सप्लाई जैसे कई कारक मिलकर कीमतों को प्रभावित करते हैं।
ऐसे में त्योहारों से पहले बढ़ती खाद्य कीमतों ने आम परिवारों के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है—त्योहार की खरीदारी करें या बढ़ते राशन के खर्च को संभालें?









