नेपाल-तिब्बत पर मंडरा रहा एक और महाजलप्रलय का खतरा! 47 ग्लेशियल झीलें बनीं ‘टाइम बम’, कभी भी मचा सकती हैं तबाही
नेपाल में हालिया फ्लैश फ्लड ने बढ़ाई चिंता, हिमालय की ऊंचाइयों पर तेजी से बदल रही ग्लेशियरों और झीलों की तस्वीर; वैज्ञानिकों ने समय रहते निगरानी और अलर्ट सिस्टम मजबूत करने की दी सलाह

नई दिल्ली। नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने एक बार फिर पूरे हिमालयी क्षेत्र में छिपे उस खतरे की ओर ध्यान खींच दिया है, जिसे लंबे समय से वैज्ञानिक बेहद गंभीर मानते रहे हैं। लांगटांग लिरुंग पर्वत क्षेत्र में ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटने के बाद पानी और मलबे का तेज बहाव त्रिशुली नदी तक पहुंचा और देखते ही देखते तबाही का मंजर बन गया।
घटना के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक चेतावनी थी या हिमालय में इससे भी बड़ी आपदा आने वाली है? वैज्ञानिक अध्ययनों और रिपोर्ट्स के मुताबिक नेपाल, तिब्बत और भारत के हिमालयी इलाकों में हजारों ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं। इनमें से 47 झीलों को संभावित रूप से खतरनाक माना गया है।
3,600 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें, 47 बेहद संवेदनशील
अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की रिपोर्ट्स के अनुसार कोशी, गंडकी और कर्णाली नदी बेसिन में करीब 3,624 ग्लेशियल झीलें दर्ज की गई हैं।
इनमें करीब 2,070 झीलें नेपाल, 1,509 तिब्बत और 45 भारत में स्थित हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इनमें 47 झीलों को संभावित रूप से खतरनाक माना गया है।
इन 47 झीलों में:
- 21 नेपाल में
- 25 तिब्बत के सीमा पार क्षेत्र में
- 1 भारत में
मौजूद है। इनमें बड़ी संख्या कोशी नदी बेसिन में बताई गई है।
यानी खतरा सिर्फ नेपाल की सीमा के अंदर मौजूद झीलों से नहीं है, बल्कि सीमा पार तिब्बत में मौजूद झीलें भी अचानक बाढ़ की वजह बन सकती हैं।
क्यों खतरनाक हैं ये ग्लेशियल झीलें?
ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में जब ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं तो उनके आसपास और आगे पानी जमा होने लगता है। धीरे-धीरे ये पानी बड़ी झील का रूप ले लेता है। इन झीलों के किनारे अक्सर बर्फ, मिट्टी और पत्थरों से बनी प्राकृतिक दीवार होती है।
अगर यह दीवार कमजोर होकर टूट जाए या अचानक झील का पानी बाहर निकल जाए, तो कुछ ही समय में लाखों-करोड़ों लीटर पानी और मलबा पहाड़ों से नीचे की ओर दौड़ सकता है।
इस तरह की घटना को Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) कहा जाता है।
20 साल में बदल गई हिमालय की तस्वीर
वैज्ञानिक अध्ययनों के मुताबिक पिछले दो दशकों में हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की संख्या और उनका क्षेत्रफल दोनों बढ़े हैं। वर्ष 2000 से 2020 के बीच कई इलाकों में झीलों का तेजी से विस्तार देखा गया।
इसके पीछे सबसे बड़ी वजहों में ग्लोबल वार्मिंग और ग्लेशियरों का तेजी से पीछे हटना शामिल है। ग्लेशियरों के पिघलने से नई झीलें बन रही हैं, जबकि पहले से मौजूद झीलों का आकार भी बढ़ रहा है।
यही बदलाव भविष्य में अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को और बढ़ा सकता है।
सिर्फ झील नहीं, ग्लेशियर टूटना भी बड़ा खतरा
हिमालय में खतरा केवल ग्लेशियल झीलों के फटने तक सीमित नहीं है। ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरना, हिमस्खलन और पहाड़ों से भारी मलबा खिसकना भी अचानक बाढ़ की वजह बन सकता है।
कई बार पहाड़ से गिरा मलबा नदी का रास्ता रोक देता है। इसके पीछे पानी जमा होता रहता है और जब प्राकृतिक अवरोध टूटता है तो पानी बेहद तेज रफ्तार से नीचे की ओर बहता है।
ग्लेशियर के साथ जमा मिट्टी-पत्थरों की प्राकृतिक दीवार यानी मोरेन भी समय के साथ कमजोर हो सकती है। बढ़ता तापमान और परमाफ्रॉस्ट का पिघलना पहाड़ी ढलानों की स्थिरता को भी प्रभावित कर सकता है।
बारिश और भूकंप ने बढ़ाई तो खतरा और गंभीर
मॉनसून के दौरान भारी बारिश, भूकंप और हिमस्खलन ग्लेशियल झीलों के लिए खतरा और बढ़ा सकते हैं। किसी झील की प्राकृतिक दीवार कमजोर होने पर एक छोटा-सा प्राकृतिक बदलाव भी बड़े जलप्रलय का कारण बन सकता है।
नेपाल-चीन सीमा का बड़ा हिस्सा ऊंचे पहाड़ी इलाकों में है। यहां मौजूद झीलों से निकलने वाला पानी बेहद कम समय में नेपाल की नदियों तक पहुंच सकता है। यही वजह है कि सीमा पार मौजूद ग्लेशियल झीलों की निगरानी भी बेहद जरूरी मानी जा रही है।
आने वाले वर्षों में बढ़ सकता है खतरा
वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले वर्षों में ग्लेशियरों से जुड़ी बाढ़ और अन्य आपदाओं का जोखिम बढ़ सकता है। उच्च पर्वतीय एशिया में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड का खतरा भविष्य में और गंभीर होने की आशंका जताई गई है।
भोटेकोशी, मेलमची और सिक्किम जैसे हिमालयी क्षेत्रों में पहले भी अचानक आई बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं भारी नुकसान कर चुकी हैं। इन घटनाओं ने साफ कर दिया है कि आपदा का कारण सिर्फ बड़ी झील का फटना नहीं, बल्कि ग्लेशियर टूटना और नदी का रास्ता अचानक बंद होना भी हो सकता है।
अब समय रहते तैयारी जरूरी
विशेषज्ञों के मुताबिक संभावित खतरनाक झीलों की लगातार निगरानी, पानी के स्तर की जांच, आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम और स्थानीय लोगों तक समय पर अलर्ट पहुंचाना बेहद जरूरी है।
खासकर उन झीलों पर ज्यादा नजर रखने की जरूरत है जो सीमा पार स्थित हैं। ऐसे मामलों में नेपाल और चीन के बीच बेहतर सूचनाओं का आदान-प्रदान और आपदा प्रबंधन सहयोग भी अहम भूमिका निभा सकता है।
कुल मिलाकर, नेपाल-तिब्बत सीमा पर मौजूद 47 संभावित खतरनाक ग्लेशियल झीलें हिमालय के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं हैं। हालिया फ्लैश फ्लड ने बता दिया है कि पहाड़ों में जमा पानी और बर्फ कब एक साथ नीचे उतरकर भारी तबाही मचा दे, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं है। ऐसे में समय रहते निगरानी और मजबूत चेतावनी व्यवस्था ही जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम कर सकती है।









