झारखंड: शिक्षकों के पक्ष में हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला, कोर्ट ने तीन महीने के भीतर फैसला लेने का दिया निर्देश, जानिये क्या है पूरा मामला…
Jharkhand: High Court rules in favor of teachers; directs authorities to take a decision within three months. Know the full story...

रांची। शिक्षकों के लिए अच्छी खबर है। झारखंड उच्च न्यायालय ने कल्याण विभाग द्वारा संचालित आवासीय विद्यालयों में कार्यरत घंटी आधारित शिक्षकों के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने समान काम के बदले समान वेतन के सिद्धांत को लागू करने पर 12 सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court) ने राज्य के कल्याण विभाग द्वारा संचालित आवासीय विद्यालयों में कार्यरत घंटी आधारित शिक्षकों के हित में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा है कि यदि घंटी आधारित शिक्षक और दिवाकालीन पहाड़िया विद्यालयों के शिक्षक समान प्रकृति का कार्य कर रहे हैं, तो उन्हें भी समान काम के बदले समान वेतन दिया जाना चाहिए।
यह आदेश झारखंड उच्च न्यायालय के महाधिवक्ता आनंद सेन की खंडपीठ द्वारा पारित किया गया है। अदालत ने कल्याण विभाग के सचिव को निर्देश दिया है कि वह इस मामले पर गंभीरता से विचार करें और 12 सप्ताह की समय-सीमा के भीतर उचित निर्णय लें।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि तथ्यों और कार्य की प्रकृति में समानता पाई जाती है, तो घंटी आधारित शिक्षकों का मानदेय भी बढ़ाया जाना चाहिए।
यह फैसला कल्याण विभाग द्वारा संचालित आवासीय विद्यालय में कार्यरत घंटी आधारित शिक्षक सिलास मुर्मू द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद दिया गया। सिलास मुर्मू ने वर्ष 2022 में अपने अधिवक्ता अजीत कुमार के माध्यम से झारखंड हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
याचिका में उन्होंने बताया था कि कल्याण विभाग राज्य में दो प्रकार के विद्यालय संचालित करता है—आवासीय विद्यालय और दिवाकालीन पहाड़िया विद्यालय।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि दोनों प्रकार के विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक लगभग समान जिम्मेदारियां निभाते हैं। पढ़ाने का कार्य, समय-सारिणी और शैक्षणिक दायित्वों में कोई विशेष अंतर नहीं है।
इसके बावजूद, दिवाकालीन पहाड़िया विद्यालय के शिक्षकों को जहां अपेक्षाकृत बेहतर वेतन और मानदेय दिया जाता है, वहीं आवासीय विद्यालयों के घंटी आधारित शिक्षकों को काफी कम मानदेय में काम करना पड़ता है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि घंटी आधारित शिक्षक लंबे समय से राज्य सरकार से समान काम के बदले समान वेतन की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक उनकी मांगों पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। इस असमानता के कारण शिक्षकों में असंतोष और आर्थिक परेशानी बढ़ रही थी।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि “समान काम के बदले समान वेतन” भारतीय संविधान और श्रम कानूनों का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यदि दो श्रेणियों के शिक्षक एक जैसा कार्य कर रहे हैं, तो केवल पदनाम या विद्यालय के प्रकार के आधार पर वेतन में भेदभाव नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कल्याण विभाग को निर्देश दिया कि वह दिवाकालीन पहाड़िया विद्यालय और आवासीय विद्यालयों के शिक्षकों के कार्य, दायित्व और जिम्मेदारियों की तुलना कर निष्पक्ष निर्णय ले।
इस फैसले के बाद राज्य भर के घंटी आधारित शिक्षकों में खुशी की लहर है। शिक्षकों का मानना है कि यह आदेश उनके वर्षों पुराने संघर्ष का सकारात्मक परिणाम है। इस कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाने में घंटी आधारित शिक्षक रीना कुमारी गुप्ता, अमित कुमार श्रीवास्तव, विनोद, फुलचंद, प्रधान, संगीता, भोगला, अमित कुमार, हीरालाल, मिल्खा, कविता सहित कई अन्य शिक्षकों का योगदान सराहनीय रहा।
घंटी आधारित शिक्षकों की ओर से हाई कोर्ट में अधिवक्ता अजीत कुमार ने मजबूती से पक्ष रखा, जिसके चलते यह ऐतिहासिक फैसला सामने आया। अब सभी की निगाहें कल्याण विभाग के फैसले पर टिकी हैं, जो तय समय-सीमा में लिया जाना है।
यह निर्णय न केवल घंटी आधारित शिक्षकों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि भविष्य में अन्य अस्थायी और संविदा शिक्षकों के मामलों में भी एक मजबूत नजीर साबित हो सकता है।









