चीनी के बढ़े दाम, पर क्या आप जानते हैं ‘सफेद सोना’ बनाने वाली मिल में कितना होता है निवेश? जानिए मिल की लागत और बनने का पूरा सच
Sugar prices have risen, but do you know how much investment goes into a mill that produces 'white gold'? Find out the cost of setting up a mill and the full story behind its creation.

नई दिल्ली: देश के बाजारों में चीनी की कीमतों में आए अचानक उछाल ने उपभोक्ता और उद्योग जगत दोनों का ध्यान आकर्षित किया है। गन्ने की फसल खेत में जितनी साधारण दिखती है, उसे दुकानों में बिकने वाली चमकदार सफेद चीनी में बदलने की प्रक्रिया उतनी ही जटिल और तकनीकी है। इसके लिए भारी-भरकम मशीनरी, बॉयलर्स, इवेपरेटर, वैक्यूम सिस्टम और उच्च गति सेंट्रीफ्यूज से लैस बड़े औद्योगिक इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होती है।
चीनी मिल की लागत: TCD क्षमता तय करती है निवेश
चीनी मिल की स्थापना में होने वाला कुल खर्च उसकी दैनिक पेराई क्षमता यानी TCD (Tons of Cane per Day) पर निर्भर करता है:
- मिनी चीनी मिल या खांडसारी प्लांट (100 – 500 TCD): छोटे स्तर की प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए भूमि, बुनियादी ढांचे और मशीनरी के आधार पर लगभग ₹3 करोड़ से ₹15 करोड़ के निवेश की जरूरत होती है।
- बड़ी कमर्शियल चीनी मिल (5,000 – 10,000 TCD): बड़े पैमाने पर गन्ने की पेराई करने वाले संयंत्रों की स्थापना लागत लगभग ₹150 करोड़ से ₹400 करोड़ या उससे अधिक होती है।
- ऑटोमेटेड प्लांट: अत्याधुनिक स्वचालित तकनीकों और डिजिटल कंट्रोल सिस्टम से लैस प्लांट्स में यह लागत और बढ़ जाती है।
इथेनॉल और बिजली उत्पादन से बढ़ता है मुनाफा
आधुनिक चीनी मिलें केवल चीनी उत्पादन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे एकीकृत बायोरिफाइनरी (Integrated Plants) के रूप में काम कर रही हैं:
- को-जनरेशन (बिजली उत्पादन): रस निकालने के बाद बचे हुए रेशेदार पदार्थ (खोई या Bagasse) को बॉयलरों में जलाकर भाप और बिजली बनाई जाती है, जिससे मिल अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करती है।
- इथेनॉल प्लांट: चीनी उत्पादन के दौरान उप-उत्पाद के रूप में मिलने वाले शीरे (Molasses) और गन्ने के रस से इथेनॉल बनाया जाता है।
अतिरिक्त निवेश: चीनी मिल में इथेनॉल और को-जनरेशन सुविधाएं जोड़ने से परियोजना की लागत में ₹50 करोड़ से ₹100 करोड़ का अतिरिक्त निवेश जुड़ जाता है।
लाइसेंस और भूमि की जरूरतें
एक नई चीनी मिल शुरू करने के लिए कई नियामक और सरकारी अनुमतियों की आवश्यकता होती है:
- कानूनी मंजूरियां: FSSAI पंजीकरण, फैक्ट्री लाइसेंस और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) से ‘सहमति और मंजूरी’ (Consent to Establish/Operate) अनिवार्य है।
- भूमि आवश्यकता: एक बड़े कमर्शियल प्लांट, गन्ना भंडारण, परिवहन यार्ड, और अपशिष्ट प्रबंधन सुविधाओं के लिए कम से कम 5 से 15 एकड़ या उससे अधिक भूमि की आवश्यकता होती है।
खेत से पैकेट तक: गन्ने से चीनी बनने के 6 चरण
1. वजन, सफाई और कटाई:
ट्रकों या ट्रैक्टरों से मिल में आए गन्ने का वजन करने के बाद उसे कन्वेयर बेल्ट पर उतारा जाता है। पत्तियों और मिट्टी को साफ करने के बाद, बड़े रोटेटिंग ब्लेड और फाइबराइजर गन्ने को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देते हैं।
2. रस निष्कासन (Milling):
तैयार गन्ने को भारी रोलर्स के बीच से गुजारा जाता है, जिससे सुक्रोज युक्त रस निचोड़ लिया जाता है। बचा हुआ सूखा रेसा ‘खोई’ कहलाता है, जिसे बॉयलर में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
3. रस का शोधन (Clarification):
कच्चे रस में मौजूद अशुद्धियों को दूर करने के लिए इसे गर्म किया जाता है और चूने (Lime) व सल्फिटेशन प्रक्रिया के जरिए रसायनों से उपचारित किया जाता है। इससे अशुद्धियां मैल बनकर अलग हो जाती हैं और साफ रस प्राप्त होता है।
4. वाष्पीकरण (Evaporation):
साफ रस में पानी की मात्रा अधिक होती है। इसे मल्टी-इफेक्ट इवेपरेटर्स में वैक्यूम की उपस्थिति में कम तापमान पर उबाला जाता है, जिससे रस गाढ़ी चाशनी (Syrup) में बदल जाता है।
5. क्रिस्टलीकरण (Crystallization):
गाढ़े सिरप को वैक्यूम पैन में डाला जाता है। इसमें छोटे ‘बीज क्रिस्टल’ मिलाकर सुक्रोज को जमने के लिए प्रेरित किया जाता है। धीरे-धीरे चीनी के दाने बनते हैं और एक गाढ़ा मिश्रण तैयार होता है जिसे मैसेक्यूइट (Massecuite) कहते हैं।
6. सेंट्रीफ्यूज, सुखाना और पैकिंग:
मैसेक्यूइट को हाई-स्पीड सेंट्रीफ्यूज मशीनों में घुमाया जाता है। सेंट्रीफ्यूगल फोर्स के कारण चीनी के क्रिस्टल टोकरी में रह जाते हैं और तरल गुड़ (Molasses) अलग हो जाता है। इसके बाद चीनी के दानों को सुखाकर ठंढा किया जाता है, ग्रेडिंग (छंटाई) की जाती है और बोरियों में पैक कर बाजार में भेजा जाता है।








