झारखंड : हाईकोर्ट ने फांसी की सजा की निरस्त, चारहरे हत्याकांड में हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, निचली कोर्ट की सजा को पलटा…
Jharkhand: High Court cancels death sentence, High Court gives major verdict in quadruple murder case, overturns lower court's sentence...

2004 के चर्चित चारहरे हत्याकांड में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष मामला साबित करने में असफल रहा।
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रांची। चर्चित चारहरे हत्याकांड को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सामने आया है। पूरा मामला पलामू जिले के पांकी थाना क्षेत्र से जुड़ा है। जहां साल 2004 में हुए जघन्य हत्याकांड की घटना घटी थी। इस मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को हाईकोर्ट ने रद्द करते हुए दोनों आरोपियों को बरी कर दिया है। यह फैसला अपील याचिका पर विस्तृत सुनवाई के बाद सुनाया गया।
यह मामला 3 दिसंबर 2004 का है, जब पलामू जिला के पांकी थाना क्षेत्र में एक ही परिवार के चार सदस्यों की निर्मम हत्या कर दी गई थी। मृतकों में एक महिला और उसके तीन मासूम बच्चे शामिल थे। इस घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया था और इसे राज्य के सबसे जघन्य अपराधों में गिना गया।
मामले में संजय यादव और चमरू यादव को आरोपी बनाया गया था। लंबे समय तक चले ट्रायल के बाद वर्ष 2020 में पलामू के जिला एवं सत्र न्यायाधीश महारानी प्रसाद की अदालत ने इस अपराध को “रेयरिस्ट ऑफ रेयर” मानते हुए दोनों आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी। इसके बाद सजा की पुष्टि के लिए मामला हाईकोर्ट में भेजा गया, जहां आरोपियों ने अपने बचाव में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस दीपक रोशन शामिल थे, ने मामले की गहन सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा है।अदालत ने अपने फैसले में विशेष रूप से चश्मदीद गवाहों के बयानों पर सवाल उठाया।
न्यायालय ने कहा कि गवाहों के बयान में गंभीर विसंगतियां और अतिशयोक्ति पाई गई, जिससे पूरी कहानी संदिग्ध हो गई। कोर्ट ने यह भी कहा कि गवाहों द्वारा दी गई जानकारी घटना के समय और पहचान के संबंध में स्पष्ट नहीं थी, जिससे अभियोजन का पक्ष कमजोर पड़ गया। आरोपियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बी.एम. त्रिपाठी ने दलील दी कि पूरे मामले में साक्ष्य कमजोर हैं और गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल हैं।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक पंकज कुमार ने अपराध की गंभीरता और क्रूरता को देखते हुए सजा को बरकरार रखने की मांग की।हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय का आधार भावनाएं नहीं, बल्कि ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होते हैं। संदेह का लाभ देते हुए कोर्ट ने दोनों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया और फांसी की सजा को निरस्त कर दिया।









