झारखंड-शिक्षकों की खबर : कोर्ट के आदेश के बावजूद शिक्षकों को सरकार ने नहीं दी राहत, अब शिक्षकों ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने की तैयारी…

Jharkhand Teachers News: Despite the court order, the government did not provide relief to the teachers, now the teachers are preparing to file a contempt petition in the High Court...

झारखंड के अंशकालीन शिक्षक समान वेतन और नीति निर्धारण में देरी से नाराज हैं। हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद कार्रवाई न होने पर अब शिक्षक अवमानना याचिका दायर करने की तैयारी में हैं।
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रांची। झारखंड में कल्याण विभाग के अंतर्गत संचालित आवासीय विद्यालयों के अंशकालीन शिक्षकों ने अब सरकार के खिलाफ कानूनी मोर्चा खोलने का निर्णय लिया है। रांची पहुंचे राज्यभर के 100 से अधिक शिक्षकों ने बुधवार को अवमानना याचिका दायर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। दरअसल, 13 जनवरी 2026 को झारखंड हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति आनंदा सेन की बेंच ने एक अहम फैसला सुनाया था।

दरअसल कोर्ट ने कल्याण विभाग के सचिव को निर्देश दिया था कि 12 सप्ताह के भीतर अंशकालीन शिक्षकों के मुद्दे पर स्पष्ट नीति बनाई जाए। इसमें “समान काम के लिए समान वेतन” जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर निर्णय लेना शामिल था।लेकिन शिक्षकों का आरोप है कि तय समयसीमा बीत जाने के बावजूद विभाग की ओर से अब तक कोई ठोस आदेश जारी नहीं किया गया है।

कोर्ट के आदेश के बावजूद क्रियान्वयन नहीं होने पर शिक्षक अब अवमानना याचिका दायर करने के लिए मजबूर हो गए हैं।यह मामला मूल रूप से वर्ष 2022 में सिल्लास मुर्मू द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें बताया गया था कि कल्याण विभाग दो प्रकार के विद्यालय संचालित करता है—आवासीय विद्यालय और दिवाकालीन पहाड़िया विद्यालय। दोनों में कार्यरत शिक्षकों की जिम्मेदारियां लगभग समान हैं, लेकिन वेतन और सुविधाओं में भारी अंतर है।

आपको बता दें कि राज्यभर में करीब 50 विद्यालयों में कार्यरत लगभग 375 अंशकालीन शिक्षक आज भी घंटी आधारित भुगतान प्रणाली पर काम कर रहे हैं। उन्हें प्रति घंटे लगभग 250 रुपये मिलते हैं, जो नियमित शिक्षकों की तुलना में काफी कम है। शिक्षकों का कहना है कि वे क्लास लेने, कॉपी जांचने, परीक्षा कार्य जैसे सभी दायित्व निभाते हैं, फिर भी उन्हें समान वेतन और दर्जा नहीं मिलता।

शिक्षकों से जुड़े इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई शिक्षक पिछले 8 से 10 वर्षों से लगातार सेवा दे रहे हैं। हर साल 31 मार्च को उनका कार्यकाल बढ़ाया जाता है, जिससे वे तकनीकी रूप से अस्थायी बने रहते हैं। इससे उन्हें न तो नौकरी की सुरक्षा मिलती है और न ही अन्य सरकारी सुविधाएं।

शिक्षकों के अनुसार, इस वर्ष स्थिति और भी गंभीर हो गई है, क्योंकि अब तक सेवा विस्तार भी नहीं दिया गया है। इससे उनकी नौकरी पर अनिश्चितता का संकट गहरा गया है। शिक्षक भोगला हांसदा और अमित श्रीवास्तव ने कहा कि यह केवल वेतन का मुद्दा नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकार की लड़ाई है। उनका कहना है कि कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद यदि सरकार कार्रवाई नहीं करती, तो यह न्यायपालिका के आदेशों की अवहेलना है।

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