रांची: HIV संक्रमित खून बच्चे को चढाये जाने का मामला हाईकोर्ट पहुंचा, दोषियों के खिलाफ FIR दर्ज करने को लेकर दाखिल हुई याचिका
Ranchi: The case of an HIV-infected blood transfusion given to a child has reached the High Court; a petition has been filed seeking the registration of an FIR against those responsible.

रांची। चाईबासा सदर अस्पताल में नाबालिग बच्चों को एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाने के गंभीर मामले में प्राथमिकी दर्ज नहीं किए जाने को लेकर पीड़ित परिवार ने झारखंड हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा सदर अस्पताल में नाबालिग बच्चों को एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाए जाने के गंभीर और संवेदनशील मामले में प्राथमिकी दर्ज नहीं किए जाने को लेकर झारखंड हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है।
पीड़ित परिवारों ने अदालत से हस्तक्षेप की मांग करते हुए इसे न केवल घोर चिकित्सकीय लापरवाही बल्कि बच्चों के मौलिक अधिकारों, विशेषकर जीवन के अधिकार का गंभीर उल्लंघन बताया है।
याचिका में कहा गया है कि अस्पताल प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के चलते नाबालिग बच्चों के शरीर में एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाया गया, जिससे उनका पूरा जीवन संकट में पड़ गया है।
इसके बावजूद पुलिस ने अब तक इस मामले में किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की है। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि यह मामला सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि एक गंभीर आपराधिक कृत्य है, जिस पर तत्काल आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए थी।
पीड़ित परिवारों ने हाई कोर्ट को बताया कि यह घटना राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की गहरी खामियों और विशेष रूप से रक्त सुरक्षा प्रणाली (ब्लड सेफ्टी सिस्टम) की कमजोरियों को उजागर करती है। याचिका में मांग की गई है कि खून के स्रोत, उसकी जांच की प्रक्रिया, ब्लड बैंक की कार्यप्रणाली, और सुरक्षा मानकों के पालन की गहन जांच कराई जाए।
यह भी कहा गया है कि यदि समय रहते उचित जांच और मानक प्रक्रियाओं का पालन किया गया होता, तो बच्चों को इस गंभीर बीमारी से संक्रमित होने से बचाया जा सकता था।याचिका में यह भी रेखांकित किया गया है कि पीड़ित बच्चे हाशिए पर रहने वाले आदिवासी समुदायों से आते हैं।
पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर इन परिवारों पर इस घटना ने गहरा मानसिक, सामाजिक और आर्थिक संकट डाल दिया है। एचआईवी जैसी गंभीर बीमारी से ग्रसित होने के बाद न केवल बच्चों का भविष्य खतरे में है, बल्कि परिवारों को समाजिक भेदभाव, इलाज का भारी खर्च और आजीवन अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।
राज्य सरकार द्वारा इस मामले में घोषित दो लाख रुपये के मुआवजे, आजीवन इलाज और पुनर्वास की घोषणा को भी याचिका में अपर्याप्त बताया गया है।
पीड़ित परिवारों का कहना है कि एचआईवी जैसी बीमारी में आजीवन इलाज, नियमित दवाइयों, पोषण और मानसिक सहयोग की आवश्यकता होती है, जिसकी तुलना में घोषित मुआवजा बेहद कम है। याचिका में यह भी कहा गया है कि पुनर्वास की कोई स्पष्ट और प्रभावी नीति अब तक सामने नहीं आई है।
पीड़ित परिवारों ने हाई कोर्ट से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध जांच के लिए अदालत की निगरानी में एक विशेष जांच टीम (एसआईटी) गठित की जाए।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि केवल एसआईटी जांच के माध्यम से ही यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि सभी दोषी व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो और उनकी आपराधिक जिम्मेदारी तय की जा सके।









