बुखार आया और तुरंत दवा खा ली? मानसून में आपकी यही गलती पड़ सकती है भारी, इन लक्षणों पर तुरंत कराएं जांच
बारिश के मौसम में डेंगू, मलेरिया और टाइफाइड का बढ़ सकता है खतरा, सिर्फ बुखार दबाने से बीमारी खत्म नहीं होती; जानिए कब डॉक्टर से संपर्क करना और कौन-सी जांच कराना जरूरी हो सकता है

नई दिल्ली। मानसून जहां गर्मी से राहत देता है, वहीं अपने साथ कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी लेकर आता है। जगह-जगह जलभराव, दूषित पानी और मच्छरों के बढ़ते प्रकोप के कारण इस मौसम में डेंगू, मलेरिया और टाइफाइड जैसे संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। इन बीमारियों में बुखार शुरुआती लक्षणों में से एक हो सकता है।
लेकिन परेशानी तब बढ़ सकती है जब लोग बुखार को सामान्य समझकर खुद ही दवा ले लेते हैं और कुछ समय आराम मिलने के बाद इसे नजरअंदाज कर देते हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, सिर्फ बुखार कम हो जाना इस बात की गारंटी नहीं है कि संक्रमण भी खत्म हो गया।
बुखार आते ही दवा खाना क्यों पड़ सकता है भारी?
डॉ. राजीव शर्मा के मुताबिक, मानसून में बुखार होने पर कई लोग बिना डॉक्टर की सलाह के बुखार कम करने वाली दवा ले लेते हैं। इससे कुछ समय के लिए आराम जरूर मिल सकता है, लेकिन अगर बुखार किसी संक्रमण के कारण है तो केवल तापमान कम करने से संक्रमण का इलाज नहीं होता।
कई बार दवा लेने के बाद बुखार कम होते ही व्यक्ति खुद को ठीक समझ लेता है और डॉक्टर से सलाह या जरूरी जांच कराने में देरी कर देता है। ऐसे में बीमारी की पहचान और उचित इलाज में देरी हो सकती है।
मानसून में आखिर क्यों बढ़ जाता है बुखार का खतरा?
बारिश के दौरान जगह-जगह पानी जमा होने से मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल माहौल बन जाता है। इससे डेंगू और मलेरिया का खतरा बढ़ सकता है।
वहीं, दूषित पानी और खराब स्वच्छता की स्थिति टाइफाइड और दूसरे पेट से जुड़े संक्रमणों की वजह बन सकती है। शरीर जब किसी संक्रमण से लड़ता है तो बुखार उसकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो सकती है।
इसलिए बारिश के मौसम में लगातार बने रहने वाले बुखार को सिर्फ मौसम का असर समझकर नजरअंदाज करना सही नहीं है।
सिर्फ लक्षण देखकर बीमारी पहचानना आसान नहीं
डेंगू, मलेरिया और टाइफाइड में बुखार के अलावा सिरदर्द, कमजोरी और शरीर में दर्द जैसे कई लक्षण एक-दूसरे से मिल सकते हैं। यही वजह है कि सिर्फ लक्षणों के आधार पर यह तय करना हमेशा संभव नहीं होता कि संक्रमण किस वजह से हुआ है।
डेंगू में शरीर और मांसपेशियों में दर्द हो सकता है। मलेरिया में ठंड लगने और पसीना आने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं, जबकि टाइफाइड में पेट और मल त्याग से जुड़ी परेशानियां हो सकती हैं। हालांकि, इन संकेतों से अकेले बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती।
डेंगू में कौन-सी जांच हो सकती है?
डेंगू की जांच बीमारी के चरण के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। शुरुआती दिनों में डॉक्टर NS1 एंटीजन और IgM एंटीबॉडी टेस्ट की सलाह दे सकते हैं। इसके अलावा मरीज की स्थिति के अनुसार CBC (Complete Blood Count) भी कराया जा सकता है, जिससे प्लेटलेट्स और खून के दूसरे मानकों पर नजर रखने में मदद मिलती है।
मलेरिया की पुष्टि कैसे होती है?
मलेरिया की जांच आमतौर पर खून के नमूने से की जाती है, जिसमें मलेरिया के परजीवी की पहचान की जाती है। इसके अलावा Rapid Diagnostic Test (RDT) के जरिए भी खून में मलेरिया से जुड़े कुछ खास एंटीजन की पहचान की जा सकती है।
कौन-सी जांच करानी है, यह मरीज के लक्षण और बीमारी के संभावित समय को देखते हुए डॉक्टर तय कर सकते हैं।
टाइफाइड में कौन-सी जांच की जाती है?
टाइफाइड की जांच के लिए अलग-अलग टेस्ट उपलब्ध हैं। इनमें Widal और Typhidot जैसे टेस्ट शामिल हैं। हालांकि, किसी भी जांच की रिपोर्ट को मरीज के लक्षण और डॉक्टर की सलाह के साथ ही समझना जरूरी है।
कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?
अगर मानसून में बुखार लगातार बना रहे, बार-बार लौटे या उसके साथ दूसरे लक्षण बढ़ने लगें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। खासतौर पर तेज कमजोरी, लगातार उल्टी, सांस लेने में परेशानी, बेहोशी, असामान्य रक्तस्राव या हालत तेजी से बिगड़ने जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए।
बारिश के कारण अस्पताल या लैब तक पहुंचना मुश्किल हो तो उपलब्ध होने पर घर से सैंपल कलेक्शन जैसी सुविधा का इस्तेमाल किया जा सकता है।
बुखार दबाएं नहीं, वजह जानना जरूरी
मानसून में हर बुखार डेंगू, मलेरिया या टाइफाइड नहीं होता, लेकिन हर बुखार को मामूली समझना भी ठीक नहीं है। बिना सलाह के दवा लेने के बजाय अगर बुखार बना रहता है या लक्षण बढ़ते हैं, तो डॉक्टर से संपर्क कर सही कारण की जांच कराना ज्यादा जरूरी है।
याद रखें—दवा से बुखार कुछ समय के लिए कम हो सकता है, लेकिन बीमारी की असली वजह जानना ही सही इलाज की पहली सीढ़ी है।









