JSSC CGL नियुक्ति रद्द होने से टूटा परिवारों का सपना! नौकरी मिली तो बदली जिंदगी, रद्द हुई तो बिखर गए सपने! किसी ने 10 साल की मेहनत की… किसी ने रेलवे-3 सरकारी नौकरियां छोड़ीं…तो किसी पर गर्भवती पत्नी और 25 हजार की EMI का बोझ…अब सबका एक ही सवाल- ‘मेरी क्या गलती?’
ललन पर गर्भवती पत्नी और 25 हजार की EMI का बोझ, नीलम के कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी, सुभाष ने झारखंड के लिए छोड़ी रेलवे की नौकरी तो नीरज ने ठुकराए कई केंद्रीय पद; नियुक्ति रद्द होने के बाद बोले- गड़बड़ी करने वालों पर कार्रवाई करें, लेकिन निर्दोषों का भविष्य क्यों छीन रहे हैं?

Ranchi News: झारखंड में JSSC CGL की नियुक्ति प्रक्रिया रद्द किए जाने के बाद सरकारी नौकरी हासिल कर चुके अभ्यर्थियों के सामने अब सिर्फ नौकरी जाने का संकट नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, परिवार की जिम्मेदारियों और भविष्य की योजनाओं के बिखरने का डर भी खड़ा हो गया है। इनमें कोई करीब 10 साल की तैयारी के बाद नौकरी तक पहुंचा था, तो किसी ने रेलवे की नौकरी छोड़कर झारखंड सरकार की सेवा चुनी थी। किसी ने तीन केंद्रीय सरकारी नौकरियों के मौके ठुकराकर अपने राज्य में रहने का फैसला किया, तो किसी के परिवार की पूरी आर्थिक जिम्मेदारी इसी नौकरी पर टिकी थी।
नियुक्तियां रद्द होने के बाद ऐसे ही पांच चयनित अभ्यर्थियों ने अपनी पीड़ा साझा की। सभी का एक ही सवाल है- अगर भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो दोषियों की पहचान कर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही? बिना व्यक्तिगत जांच के सभी चयनित अभ्यर्थियों को एक ही नजर से क्यों देखा जा रहा है?
10 साल की तैयारी, कानूनी लड़ाई के बाद मिली नौकरी और अब फिर बेरोजगारी
देवघर के रहने वाले ललन कुमार पांडे की कहानी इस पूरे विवाद की गंभीरता को सामने रखती है। ललन के मुताबिक, उन्होंने सरकारी नौकरी के लिए करीब 10 वर्षों तक तैयारी की। नियुक्ति को लेकर करीब एक साल तक CID जांच चली और इसके बाद उन्हें हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।
अदालती प्रक्रिया के बाद उन्हें नौकरी मिली और उन्होंने जमशेदपुर के जल संसाधन विभाग में सहायक प्रशाखा पदाधिकारी के रूप में करीब सात महीने तक काम किया। उन्हें उम्मीद थी कि अब परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और वर्षों की मेहनत का फल मिल गया है।
लेकिन 17 तारीख की रात नियुक्तियां रद्द होने की जानकारी मिलने के बाद उनकी जिंदगी फिर से अनिश्चितता में चली गई।
ललन अपने सात सदस्यों वाले परिवार में अकेले कमाने वाले सदस्य हैं। उनकी पत्नी गर्भवती हैं और परिवार पर बैंक लोन की करीब 25 हजार रुपये मासिक EMI भी है। नौकरी जाने के बाद उन्हें परिवार के खर्च और लोन की किस्त दोनों की चिंता सता रही है।
ललन का कहना है कि परिवार में तनाव इतना बढ़ गया है कि लोग ठीक से खाना तक नहीं खा पा रहे हैं। हालांकि वह जांच के खिलाफ नहीं हैं। उनका कहना है कि अगर किसी ने गलत तरीके से नौकरी हासिल की है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन निर्दोष अभ्यर्थियों को उसकी सजा नहीं मिलनी चाहिए।
सात-आठ साल की मेहनत के बाद सूरज को मिली थी पहली सरकारी नौकरी
देवघर के सारठ निवासी सूरज कुमार ने भी सरकारी नौकरी के लिए वर्षों तक संघर्ष किया। करीब सात-आठ साल की तैयारी और कई असफलताओं के बाद उन्हें पहली सरकारी नौकरी मिली थी।
सूरज की नियुक्ति रांची के MDI बिल्डिंग स्थित शिक्षा विभाग में सहायक प्रशाखा पदाधिकारी (ASO) के पद पर हुई थी। लेकिन अब नियुक्ति रद्द होने के बाद उनका कहना है कि वर्षों की मेहनत से हासिल नौकरी को इस तरह खत्म नहीं होने दिया जा सकता।
सूरज ने बताया कि उन्होंने इससे पहले JPSC और रेलवे NTPC समेत कई प्रतियोगी परीक्षाएं दी थीं। कई परीक्षाओं में वह अंतिम चरण तक पहुंचे, लेकिन किसी न किसी स्तर पर बाहर हो गए।
रेलवे में स्टेशन मास्टर पद के लिए वह साइकोलॉजिकल टेस्ट में बाहर हुए। लेवल-5 की भर्ती में टाइपिंग टेस्ट में डिसक्वालीफाई हुए, जबकि लेवल-3 की मेरिट लिस्ट में वह महज डेढ़ अंक से पीछे रह गए।
लगातार असफलताओं के बाद जब आखिरकार सरकारी नौकरी मिली तो परिवार में खुशी थी। अब नियुक्ति रद्द होने से सूरज बेहद निराश हैं। उनका कहना है कि वह अपनी नौकरी को किसी राजनीतिक विवाद की भेंट नहीं चढ़ने देंगे और उन्हें सरकार के साथ-साथ न्यायालय से भी न्याय की उम्मीद है।
नीलम के कंधों पर था परिवार का सहारा, अब जिम्मेदारियां और बढ़ीं
पश्चिमी सिंहभूम के चक्रधरपुर की रहने वाली नीलम जमुदा भी नियुक्ति रद्द होने से प्रभावित हुई हैं। वह रांची के FOP बिल्डिंग स्थित ग्रामीण विकास विभाग में कार्यरत थीं।
नीलम के मुताबिक, उन्होंने वर्ष 2019-20 से CGL परीक्षा की तैयारी शुरू की थी। इससे पहले वह बैंकिंग परीक्षाओं की भी तैयारी कर चुकी थीं। लंबे संघर्ष के बाद जब सरकारी नौकरी मिली तो यह उनके परिवार के लिए आर्थिक सहारा बन गई।
नीलम अपने परिवार की बड़ी बेटी हैं। उनके पिता सेवानिवृत्त हैं और परिवार में मां, दो भाई और एक दिव्यांग बुआ हैं। वह अपने भाइयों की पढ़ाई समेत परिवार की कई जिम्मेदारियां संभाल रही थीं।
नियुक्ति रद्द होने के बाद उनके सामने अब परिवार की जिम्मेदारियां संभालने की चुनौती और बढ़ गई है।
नीलम सवाल उठाती हैं कि अगर भर्ती में कहीं गड़बड़ी हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उनका कहना है कि हर अभ्यर्थी को दोषी मान लेना उचित नहीं है।
वह सवाल करती हैं कि क्या किसी भीड़ या ग्रुपिज्म के दबाव में नियुक्तियां रद्द की जानी चाहिए? उनके मुताबिक, अगर किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो दोषियों की पहचान होनी चाहिए, न कि सभी चयनित अभ्यर्थियों को एक जैसा माना जाए।
रेलवे की नौकरी छोड़कर झारखंड आए सुभाष, अब वही फैसला बना सबसे बड़ा दर्द
गिरिडीह के सुभाष ने अपने गृह राज्य झारखंड में सेवा करने के लिए रेलवे की नौकरी तक छोड़ दी थी। करीब तीन साल की तैयारी और मेहनत के बाद उन्हें धुर्वा स्थित IG ऑफिस में सहायक प्रशाखा पदाधिकारी के पद पर नियुक्ति मिली।
सुभाष के मुताबिक, वह अपनी जन्मभूमि को ही कर्मभूमि बनाना चाहते थे। रेलवे की नौकरी उनके पास थी, लेकिन उन्होंने झारखंड सरकार की नौकरी इसलिए चुनी क्योंकि वह अपने राज्य में रहकर लोगों की सेवा करना चाहते थे।
अब नियुक्ति की अधिसूचना वापस लिए जाने के बाद उनकी नौकरी भी चली गई। जिस फैसले को उन्होंने अपने करियर का बेहतर विकल्प समझा था, वही अब उनके लिए सबसे बड़ा दर्द बन गया है।
सुभाष का कहना है कि उन्होंने रेलवे की नौकरी छोड़कर झारखंड में सेवा करने का फैसला किया था। इसलिए सरकार को उनके भविष्य को ध्यान में रखते हुए मामले पर दोबारा विचार करना चाहिए।
उनकी मांग है कि भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जाए और जांच में निर्दोष पाए जाने वाले अभ्यर्थियों को दोबारा उनके पद पर बहाल किया जाए।
तीन केंद्रीय सरकारी नौकरियां छोड़ीं, सिर्फ झारखंड में सेवा करने के लिए
पलामू के नीरज सिंह की कहानी शायद इस पूरे विवाद में सबसे अलग है। सरकारी नौकरी के कई बेहतर विकल्प उनके सामने थे, लेकिन उन्होंने झारखंड को अपनी कर्मभूमि बनाने का फैसला किया।
नीरज वर्तमान में झारखंड सरकार के पथ निर्माण विभाग में असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे। इससे पहले उनका चयन असिस्टेंट टैक्स कलेक्टर के पद पर भी हुआ था। इसके अलावा हैदराबाद में GST इंस्पेक्टर, हैदराबाद और मुंबई में पोस्टल असिस्टेंट तथा चक्रधरपुर रेल मंडल में टिकट कलेक्टर के पद पर भी उनका चयन हुआ था।
इनमें से कई नौकरियां ऐसी थीं, जिन्हें पाने के लिए युवा वर्षों तक तैयारी करते हैं। लेकिन नीरज ने इन अवसरों को छोड़कर झारखंड में रहकर अपने राज्य की सेवा करने का फैसला किया।
नीरज अपने परिवार के इकलौते बेटे हैं। उनके पिता किसान हैं और मां भी खेती-किसानी में उनका हाथ बंटाती हैं। ऐसे में माता-पिता के करीब रहना और परिवार की जिम्मेदारी निभाना उनके लिए महत्वपूर्ण था।
रांची में नौकरी मिलने के बाद उन्हें लगा था कि अब उनका सपना पूरा हो गया है। लेकिन नियुक्ति रद्द होने के बाद भविष्य फिर अनिश्चित नजर आने लगा है।
नीरज का सीधा सवाल है- “मैंने दूसरी नौकरियां छोड़कर अपने राज्य की सेवा करने का फैसला किया। क्या अपने राज्य की सेवा करना अपराध है?”
उनका कहना है कि अगर उन्होंने गलत तरीके से नौकरी हासिल की है तो सरकार जांच करे और दोषी पाए जाने पर उन्हें बर्खास्त करे, लेकिन पहले व्यक्तिगत जांच तो हो।
पांचों की कहानी अलग, लेकिन सवाल एक- ‘अगर मेरी गलती नहीं तो सजा क्यों?’
ललन, सूरज, नीलम, सुभाष और नीरज की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। किसी के परिवार में गर्भवती पत्नी है और लोन की EMI का बोझ है, किसी के परिवार की जिम्मेदारी उसके कंधों पर है। किसी ने वर्षों की असफलताओं के बाद नौकरी हासिल की, तो किसी ने रेलवे और केंद्रीय सरकारी नौकरियों के मौके छोड़कर झारखंड को चुना।
लेकिन पांचों की मांग लगभग एक जैसी है- भर्ती प्रक्रिया में अगर गड़बड़ी हुई है तो निष्पक्ष जांच हो, दोषियों की पहचान की जाए और उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए।
उनका कहना है कि वे किसी जांच से भाग नहीं रहे हैं। वे अपना पक्ष रखने और अपनी नियुक्ति की जांच कराने के लिए तैयार हैं। लेकिन बिना व्यक्तिगत जांच के पूरी नियुक्ति प्रक्रिया को रद्द कर देने से उन अभ्यर्थियों पर भी असर पड़ रहा है, जिन्होंने वर्षों की मेहनत और अपनी योग्यता के आधार पर नौकरी हासिल की है।
नौकरी से ज्यादा दांव पर है वर्षों की मेहनत और परिवार का भविष्य
JSSC CGL नियुक्ति रद्द होने के बाद सामने आई इन पांच कहानियों ने विवाद का एक दूसरा पहलू भी सामने ला दिया है। जहां एक ओर भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता और कथित गड़बड़ियों की जांच का सवाल है, वहीं दूसरी ओर उन अभ्यर्थियों का भविष्य भी है जो नौकरी हासिल करने के बाद अपनी जिंदगी की नई शुरुआत कर चुके थे।
अब इन अभ्यर्थियों की नजर सरकार और न्यायालय की अगली कार्रवाई पर है। उनका कहना है कि दोषियों को सजा मिलनी चाहिए, लेकिन अगर कोई निर्दोष है तो उसके वर्षों के संघर्ष और परिवार की आजीविका को भी बचाया जाना चाहिए।
और इसी वजह से इन पांचों की जुबान पर एक ही सवाल है— “अगर मेरी कोई गलती नहीं है, तो मुझे सजा क्यों?”









