Jharkhand High Court: रिकवरी पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, ‘केवल आरोप से किसी कर्मचारी के वेतन या सेवानिवृत्ति लाभ नहीं रोक सकते’ एक ही मामले में दो बार सजा गलत
Jharkhand High Court ने कहा कि रिटायर सरकारी कर्मचारी से 36 साल पुराने अतिरिक्त वेतन की वसूली नहीं की जा सकती। जानें कोर्ट का पूरा फैसला और मामला।

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के वेतन और सेवानिवृत्ति लाभ से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा है कि बिना आरोप सिद्ध हुए अतिरिक्त वेतन की वसूली नहीं की जा सकती है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि किसी सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी से करीब 36 वर्ष पुराने अतिरिक्त वेतन की वसूली नहीं की जा सकती, खासकर तब जब उसके खिलाफ विधि सम्मत विभागीय कार्रवाई में संबंधित आरोप पूरी तरह सिद्ध नहीं हुए हों।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल फर्जीवाड़े का आरोप लगा देने भर से किसी कर्मचारी के वेतन या सेवानिवृत्ति लाभ को रोकना उचित नहीं है। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि यदि आपराधिक कृत्य का आरोप है तो प्राथमिकी दर्ज करने से कानून कर्मचारी को स्वत: संरक्षण नहीं देता।
सरकार की अपील पर हाईकोर्ट का फैसला
मामले में राज्य सरकार की ओर से एकल पीठ के आदेश को चुनौती दी गई थी। खंडपीठ ने सुनवाई के बाद एकल पीठ के आदेश को अधिकांश हिस्सों में बरकरार रखा।एकल पीठ ने कर्मचारी से कथित अतिरिक्त वेतन की वसूली पर रोक लगाई थी और उनके सेवानिवृत्ति लाभ जारी करने का निर्देश दिया था। खंडपीठ ने इस हिस्से को बरकरार रखा।
हालांकि, कर्मचारी के खिलाफ FIR दर्ज करने पर लगाई गई रोक को हटा दिया गया। कोर्ट ने कहा कि किसी आपराधिक कृत्य के आरोप में प्राथमिकी दर्ज करने से कानून किसी कर्मचारी को स्वत: सुरक्षा प्रदान नहीं करता।
1975 में ट्रेसर के पद पर हुई थी नियुक्ति
यह मामला तारकेश्वर प्रसाद सिंह से जुड़ा है। उनकी नियुक्ति 13 जनवरी 1975 को ट्रेसर के पद पर हुई थी। फरवरी 1980 में उन्हें अस्थायी तौर पर जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर प्रोन्नति दी गई।
बाद में इस पदोन्नति को लेकर विवाद हुआ और वर्ष 1986 में उन्हें फिर ट्रेसर के पद पर भेज दिया गया। वर्ष 1987 में पूर्व आदेश वापस लिए जाने के बाद उन्हें दोबारा जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर बहाल कर दिया गया और उनकी नियुक्ति को स्थायी कर दिया गया। बाद में उन्हें एसीपी का लाभ भी मिला।
2011 में विभागीय जांच और मिली सजा
वर्ष 2011 में तारकेश्वर प्रसाद सिंह को निलंबित किया गया और उनके खिलाफ 14 आरोप लगाए गए। इनमें जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर कथित रूप से गलत तरीके से बने रहने और उस पद का वेतन लेने का आरोप भी शामिल था।
विभागीय जांच के बाद कुछ आरोप प्रमाणित पाए गए। इसके आधार पर कर्मचारी को निंदा की सजा दी गई और दो वेतन वृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोक दी गईं।इसके बाद विभाग ने उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराने का निर्णय लिया। इसी क्रम में वर्ष 2013 में जामताड़ा और वर्ष 2014 में दुमका थाना में मामले दर्ज किए गए।तारकेश्वर प्रसाद सिंह 31 जुलाई 2013 को सेवानिवृत्त हुए थे।
एक ही आरोप में दोबारा सजा नहीं दी जा सकती
मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि जूनियर अकाउंट्स क्लर्क का पद कथित रूप से अवैध तरीके से धारण करने के आरोप को लेकर विभागीय जांच पहले ही हो चुकी थी और कर्मचारी को उस मामले में दंडित भी किया जा चुका था।हाईकोर्ट ने इसी आधार पर कथित अतिरिक्त वेतन की वसूली पर रोक और सेवानिवृत्ति लाभ जारी करने संबंधी एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा।










