झारखंड: चर्चित फर्जी FIR मामले में अवर सचिव, डीएसपी व दो इंस्पेक्टरों ने किया कोर्ट में सरेंडर, जानिये क्या है पूरा मामला, जिसमें घिर गया था पूरा पुलिस प्रशासन

Jharkhand: Under Secretary, DSP and two inspectors surrender in court in the infamous fake FIR case. Find out the full story, which ensnared the entire police administration.

हजारीबाग में 10 साल पुराने चर्चित फर्जी एफआईआर मामले में जमानतीय वारंट जारी होने के बाद कई अधिकारियों ने अदालत में आत्मसमर्पण किया। कोर्ट ने सभी को जमानत दे दी है, जबकि मामले की सुनवाई जारी है।
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हजारीबाग। हजारीबाग जिले में वर्ष 2016 के बहुचर्चित फर्जी एफआईआर मामले में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। जमानतीय वारंट जारी होने के बाद पंयजल एवं जल स्वच्छता विभाग के अवर सचिव कुमुद झा, मुख्यमंत्री सुरक्षा में तैनात इंस्पेक्टर रामदयाल मुंडा, स्पेशल ब्रांच इंस्पेक्टर अकील अहमद और सेवानिवृत्त डीएसपी अखिलेश सिंह ने अदालत में सरेंडर किया। इसके बाद न्यायालय ने उन्हें जमानत प्रदान कर दी।

यह मामला बड़कागांव थाना कांड संख्या 135/2016 से जुड़ा हुआ है, जिसमें आरोप है कि तत्कालीन अधिकारियों द्वारा एफआईआर में हेरफेर किया गया था। झारखंड हाईकोर्ट द्वारा पूर्व में इस मामले में जारी अंतरिम रोक हटाए जाने के बाद निचली अदालत ने जमानतीय वारंट जारी किया था।

हजारीबाग के न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी की अदालत में चल रहे इस मामले में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट विवेक कुमार की अदालत में आरोपियों ने आत्मसमर्पण किया। इससे पहले इस प्रकरण की सुनवाई न्यायिक मजिस्ट्रेट शिवानी शर्मा की अदालत में हुई थी, जहां प्रथम दृष्टया आरोपियों को दोषी मानते हुए उनके खिलाफ समन जारी किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो 17 मई 2016 को चिरुडीह में हुई एक घटना के बाद बड़कागांव थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोप है कि तत्कालीन थानेदार ने कार्यपालक दंडाधिकारी कुमुद झा के आवेदन में फेरबदल कर दिया और मूल आवेदन में जहां केवल दो लोगों के नाम थे, वहां 29 अन्य नाम जोड़ दिए गए।

इस मामले में शिकायतकर्ता मंटू सोनी उर्फ शनिकांत ने अदालत में परिवाद दायर किया था। सुनवाई के दौरान अधिवक्ताओं की दलीलों और गवाहों के बयान के आधार पर अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 166, 167, 218 और 220 के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता हुआ पाया और संज्ञान लेते हुए समन जारी किया।

महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि एफआईआर की टाइप की गई कॉपी और कुमुद झा द्वारा दिए गए हस्तलिखित आवेदन में अंतर पाया गया। यहां तक कि हस्ताक्षर और तारीख की लिखावट में भी भिन्नता देखी गई, जिससे मामले की गंभीरता और बढ़ गई।एनटीपीसी के पूर्व जीएम टी. गोपाल कृष्ण को भी इस मामले में आरोपी बनाया गया था, जिन पर हाईकोर्ट ने जुर्माना भी लगाया था।

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