झारखंड : 4 साल की बच्ची की कस्टडी पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मां को मिली अंतरिम कस्टडी; पिता को भी मुलाकात का अधिकार, कोर्ट ने कहा…
Jharkhand: High Court's major ruling on the custody of a 4-year-old girl; mother granted interim custody, father also given visitation rights; the Court stated...

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने बच्चे की कस्टडी मामले में अहम निर्देश दिया है। 4 साल की बिटिया अपनी मां की कस्टडी में रहेगी, हालांकि पिता को अपनी बेटी से मिलने का अधिकार रहेगा। साढ़े चार साल की बच्ची की अंतरिम कस्टडी से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
हजारीबाग फैमिली कोर्ट के उस आदेश को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है, जिसमें बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को देने से इनकार किया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभिभावकता से जुड़े मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बच्चे का हित और उसकी भलाई है।
फैमिली कोर्ट ने कस्टडी की जगह सिर्फ मुलाकात पर दिया था आदेश
हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने मां की ओर से मांगी गई अंतरिम कस्टडी के मूल मुद्दे पर उचित तरीके से विचार नहीं किया और केवल बच्ची से मुलाकात के अधिकार को लेकर आदेश पारित कर दिया।खंडपीठ ने इसे आदेश में गंभीर त्रुटि माना और फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने फर्स्ट अपील संख्या 335/2026 पर सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि मुख्य अभिभावकता मामले के अंतिम फैसले तक बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां के पास रहेगी। वहीं, पिता को बच्ची से मिलने का अधिकार दिया जाएगा।
दोनों विनोबा भावे विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक
मामले के अनुसार, डॉ. संगीता विश्वकर्मा और राहुल रंजन दोनों विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग में सहायक प्राध्यापक हैं। दोनों का विवाह 16 मई 2017 को हुआ था। इसके बाद 8 मार्च 2022 को आईवीएफ प्रक्रिया के जरिए बेटी एकांशी शर्मा का जन्म हुआ।
बाद में दंपती के बीच वैवाहिक विवाद बढ़ गया और बच्ची की कस्टडी को लेकर मामला अदालत तक पहुंचा। मां की ओर से आरोप लगाया गया कि पिता बच्ची को अपने पास रखकर उसे मिलने तक नहीं दे रहे थे। वहीं, पिता ने इन आरोपों से इनकार किया।
हाईकोर्ट ने कहा- बच्चे का हित सबसे ऊपर
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि कस्टडी और अभिभावकता के मामलों में माता-पिता के अधिकारों से ज्यादा बच्चे का सर्वोत्तम हित महत्वपूर्ण है।अदालत ने हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6(ए) और 13 तथा गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 12 का उल्लेख करते हुए कहा कि पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी सामान्य परिस्थितियों में मां के पास होनी चाहिए, जब तक इसके विपरीत कोई मजबूत कारण मौजूद न हो।
बच्ची की मानसिक और भावनात्मक भलाई भी जरूरी
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि छोटे बच्चों के विकास के लिए मां और पिता दोनों का स्नेह और साथ महत्वपूर्ण है। हालांकि अंतरिम कस्टडी का फैसला करते समय अदालत को बच्चे की मानसिक, शारीरिक, नैतिक और भावनात्मक भलाई को प्राथमिकता देनी होती है।अदालत ने इसी आधार पर मुख्य कस्टडी मामले का अंतिम फैसला आने तक बच्ची को मां की अंतरिम कस्टडी में रखने का निर्देश दिया है।
अंतिम कस्टडी का फैसला अभी बाकी
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्ची की स्थायी कस्टडी का मामला अभी फैमिली कोर्ट मंक लंबित रहेगा। यानी हाईकोर्ट का मौजूदा आदेश अंतिम कस्टडी का फैसला नहीं है।फिलहाल अंतिम निर्णय होने तक बच्ची मां के पास रहेगी और पिता को बच्ची से मुलाकात का अधिकार मिलेगा। इस तरह हाईकोर्ट ने एक तरफ बच्ची की कम उम्र और उसके हित को ध्यान में रखा, वहीं दूसरी तरफ पिता के साथ उसके संपर्क को भी बनाए रखने का रास्ता रखा है। हाईकोर्ट का ये फैसला काफी महत्वपूर्ण हो सकता है।








